अंग विच्छेदन और पुनर्वास पर अध्ययन करने के लिए बनाये गये अन्तर्राष्ट्रीय वेबसाइट पर जब मैंने देखा अपनी तस्वीर
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| physiopedia.com पर मेरी लाइलाज़ बीमारी Winging of scapula के बारे में बताते हुए डॉक्टर का स्क्रीनशॉट |
आदि काल से ही विश्व शान्ति के लिए सर्वस्व त्याग कर भी विचलित नहीं होने वाले भृगुवंशी समाज में उत्पन्न कौशिक गोत्रीय समुदाय से सम्बन्धित पौराणिक इतिहास को साझा करने वाला एक संवाद मंच है यह ब्लॉग। इस ब्लॉग से मेरा एकमात्र उद्देश्य यह है कि विश्व बन्धुत्व के भाव से सभी जाति और वर्ग का साथ देते-देते हमारे वंश के जो कबिले विभिन्न देशों में रहते हुए हमसे बिछुड़ कर भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उन लोगों के साथ अपनी भावी पीढ़ी को भी यह बता सकूं कि वे किस महान वंश के वंशज़ हैं।
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माँ-बाप की सेवा करने वाले को आशिर्वाद ही मिलता है ऐसी बात नहीं है। सत्यानन्द ने तो अपने माँ-बाप की खूब सेवा की थी, मगर उसके घर पर आये दो साधुओं ने तीसरी कक्षा में पढ़ रहे सत्यानन्द की ओर ईशारा करते हुए उसकी माँ से जैसे ही कहा कि "यह नाग अपने माता-पिता के वृद्ध होने पर तलवार से गर्दन काट कर हत्या कर देगा। अपनी सुरक्षा चाहती हैं तो इसे मुझे दे दीजिए।" उस समय तो उसकी माँ ने उस साधु की बात पर विश्वास नहीं किया था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे सत्यानन्द के प्रति उसकी माँ के मन में नफ़रत का भाव बढ़ता जा रहा था। अपने बेटे के हाथों अपनी होने वाली हत्या की कल्पना कर के उसके प्रति घृणा बढ़ती जा रही थी। सत्यानन्द के पिता जो भारतीय रिजर्व बैंक में उस समय सहायक कोषपाल थे, घर में पैसे की कमी नहीं थी, फिर भी उसे शिक्षा-दीक्षा रोक कर घर की सेवा में लगा दिया गया था। राजधानी पटना में रहते हुए भी नजदीकी गाँव में रहने वाले यादवों के लड़कों के साथ दिन भर गाय चराता, घर के बगल में स्थित आटा चक्की की दुकानों के बन्द रहने पर भी उसे गेहूं पिसवा कर ही लौटना पड़ता। पटना में स्ट्राइक रहने के कारण सभी मीलों और दुकानों के बन्द रहने पर भी चाहे जहाँ से भी हो गेहूंँ पिसवा कर ही लौटना पड़ता था। अन्यथा बिना काम पूरा किये वापस लौटने पर अपनी माँ और बड़े भाई से मार खाने के लिए तैयार रहना पड़ता था। पटना के लगभग सभी मील वाले उसकी इस मजबूरी के बारे में जान गये थे, इसके कारण कोई न कोई खतरे मोल लेकर उसकी मदद कर ही देता था। वापस लौटने पर घर से कुछ दूरी पर स्थित कुँए से पानी भर-भर कर नाद और ड्राम को भरना पड़ता, कुएं से पानी भर-भर कर ही बन रहे मकान की दीवारों को पटाना पड़ता। इसके बाद भी कोई न कोई बहाना बनाकर खाना खाने से पहले, खाना खाते-खाते और खाना खाने के बाद भी पिटाना ही पड़ता था। यही उसका रोज़ का नियम बन गया था।
उसे नमकीन के बजाए मीठा भोजन ज्यादा पसन्द था। इसके बावजूद घर में मिठाई आदि आने पर उसकी माँ उसे सत्यानन्द से छुपा कर रखती थी। कई बार तो उसके सामने ही अपने अन्य बच्चों और घर में आये हुए रिश्तेदारों में उन मिठाईयों को बाँट देती, लेकिन उसे यह कह कर भगा देती थी कि "तू हम्मर गर्दन काटबेऽ आउ हम तोरा मिठाई खिलइयऊ"?.. और उसे फिर किसी काम में फँसा देती थी। लेकिन जब कोई मिठाई खराब हो जाता तो बड़े प्रेम से उसे अपने पास बुलाती और कहती, "तोरा मिठाई अच्छा लग हउ नऽ?.. ले, ओन्ने जाके खा लेऽ। न तऽ कोनो छीन लेतउ।" उस मिठाई से आ रही दुर्गन्ध के कारण सत्यानन्द वह मिठाई नहीं लेना चाहता तब उसकी माँ कहती, "तोरे ला नुका के रखले हलियऊ। लेकिन यादे हेरा गेलियऊ हल बेटाऽ। जादे खराब न हबऽ, बस ऊपर से पोछ दीहऽ।" कह कर खुद ही अपनी मिठाई को पोछ देती और कहती -" बढ़ियां हो गेलई नऽ, लऽ अब खा लऽ।"
खराब हो कर जाला लग चुके मिठाई को मुँह से लगाते ही मुँह का स्वाद खराब हो जाता था। लेकिन अपनी माँ की झूठी ही सही मगर उसके क्षणिक प्यार का सुख भोगने के लिए वह उस मिठाई की कड़वाहट को भूल कर के माँ की ममता का प्यास मिटाने के लिए उस मिठाई के साथ माँ के द्वारा दिये गये सभी रोटियों को सुबक-सुबक कर रोते हुए खा जाता था। उसकी आँखों से आँसू इसलिए नहीं निकलते की उसकी माँ उसे न खाया जाने वाला चीज़ खाने के लिए मजबूर कर रही है, बल्कि वह यह सोच कर रोता था कि उसने कौन सा गुनाह किया है, जिसके कारण उसकी माँ भी उससे नफ़रत करती है।
उस समय उसके घर में संजय नामक जो नौकर था उसे वेतन और तीनों समय भोजन के अलावा साल में एक सेट नया कपड़ा भी दिया जाता, जबकि बेचारा सत्यानन्द को अपने पिता और भाईयों के छोड़े हुए पुराने कपड़े ही दिए जाते थे। यहाँ तक कि उसे अपने छोटे भाईयों के भी छोड़े हुए कपड़े पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। उस घर में उसकी जो औकात थी, उसे जानने के बाद सत्यानन्द के ननिहाल से आया हुआ घर का नौकर और किरायेदार भी नाजायज़ फायदा उठाते थे। साधुओं के द्वारा कही हुई भविष्यवाणी के भय से उसकी माँ के मन में बैठा हुआ विश्वास झूठा साबित हो जाए, सिर्फ इसके कारण वह घर के सभी जुल्मों को चुपचाप सहते हुए अपने जैसे मजबूर और दुखी लोगों की बाहर में मदद करता था।
एक दिन अचानक बिना कोई पूर्व सूचना के उसकी तलाश करते हुए बिहार पिपुल्स पार्टी के किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव प्रमोद सिंह और प्रदेश उपाध्यक्ष राजकुमार सिंह अपने समर्थकों के साथ सत्यानन्द के घर चले गए, तब उनके साथ चल रहे लोगों के हाथों में राइफल्स देखते ही सत्यानन्द की माँ ने काँपते हुए उससे कहा था कि "तू मर काहे न जा हे रेऽ। काऽ कर के अइले हे, कि घर में डकैत घुस्सल जाइत हऊ?" लेकिन जैसे ही उन लोगों के बारे में सत्यानन्द के पिता को पता चला उन्हें आदर पूर्वक घर में बैठाकर चाय-नाश्ता करवाने लगे थे।
घर में ऐसे लोगों के आने से वह काफी दहशत में था। उसे इस बात का भय था कि, इन लोगों के जाते ही उसकी जम कर धुनाई होगी। लेकिन उसे अपने पास बुला कर पीठ ठोकते हुए जिस समय उसके पिता ने लोगों से कहा था कि "हम तो इसे मउगा समझते थे। घर में तो इसकी बोली, निकलती ही नहीं है। बाहर यह क्या राजनीति करेगा?" लेकिन उनके घर में आये हुए लोगों ने उनकी बात को काटते हुए जैसे यह कहा कि "ऐसी बात नहीं है, चचा! यह बहुत ही बहादुर लड़का है। इसी के कारण इन्हें पटना विधान सभा क्षेत्र का प्रचार प्रभारी बनाया गया है।" पटना मध्य से उम्मीदवार बनाये गये सुरेन्द्र श्रीवास्तव के घर में मीटिंग का आयोजन किया जा रहा है, उसकी तैयारी के लिए ही इनसे बात करने के लिए आये हैं। कल ही शाम में मोटरसाइकिल रैली भी निकालने की योजना है, उसके लिए भी इनके तरफ़ से कम से कम २०० मोटर साइकिल होना जरूरी है। इसकी व्यवस्था कैसे होगी, इसके बारे में भी मीटिंग में ही बताया जाएगा। इसलिए इनका उस मीटिंग में रहना जरूरी है।" ब्रह्मपुर के राजकुमार जी के द्वारा अपना मकसद खुल कर बताने के बाद वह पहला मौका था जब सत्यानन्द को अपने बगल में बैठाकर उसकी पीठ थपथपाते हुए उसके पिता ने शाबाशी दिया था। बड़े गर्मजोशी के साथ वे सत्यानन्द की तारीफ करते हुए पहली बार कहे थे, "आखिर बेटा किसका है? इसकी बोली नहीं निकलती थी, इसके लिए ही हम इसे डाँटते-डपटते रहते थे। अच्छा है इसका कण्ठ खुल गया। सब काली मइया की कृपा है। इस पर थोड़ा ध्यान दीजिएगा, छोटी-छोटी बातों से भावुक हो जाता है यह।" उस दिन सत्यानन्द को पहली बार महसूस हुआ था कि उस घर में उसे कोई चाहने वाला भी है।
सत्यानन्द के कारण बिहार के स्वास्थ्य मंत्री डॉ नरेन्द्र सिंह, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा में उत्तर प्रदेश के महामंत्री सह उत्तर प्रदेश के सहकारिता मंत्री प्रेम प्रकाश सिंह, उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष शिवराम सिंह गौड़, उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष उमाशंकर सिंह गहमरी, बिहार के प्रदेश अध्यक्षराराम शंकर सिंह, युवा मंच के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल सिंह, बिहार पिपुल्स पार्टी के अध्यक्ष आनन्द मोहन, भारतीय जनता पार्टी, पटना के सांसद सीपी ठाकुर, बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, आरा के विधायक अमरेन्द्र प्रताप सिंह, पटना मध्य के विधायक अरूण कुमार सिन्हा सहित कैलाशपति मिश्र, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, इन्दर सिंह नामधारी, राम विलास पासवान, राम कृपाल यादव, गुलाम गौस, संजय पासवान, पप्पू यादव और सैय्यद मुशीर अहमद जैसे लोगों के साथ मंच साझा कर चुके सत्यानन्द के बारे में काफी लम्बे अन्तराल के बाद जब उनके पिता को यह पता चला था कि उनका बेटा भाजपा निवेशक मंच के प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य सहित बाढ़ जिला समिति के महामंत्री के रूप में बहुत अच्छा काम कर रहा है, तब भी उसे अपने पिता का आशिर्वाद मिला था।
यादवों और राजपूतों के बीच छिड़े खूनी संघर्ष के दौरान अपनी जान की परवाह किये बगैर सत्यानन्द ने जिस तरह से अपनी जान पर खेल कर उस लड़ाई को खत्म कराया था, उसके कारण उसके गाँव के राजपूतों और पड़ोसी गाँव के यादवों के द्वारा भी सत्यानन्द को मुखिया का चुनाव लड़ने के लिए दबाव बनाया गया था। उस समय सत्यानन्द के पिता भी उसके साथ थे और उन दिनों अखबारों में आये दिन आने वाले सत्यानन्द के कार्यक्रमों की सूचनाओं से गौरवान्वित होते हुए अपने मित्रों के सामने अक्सर कहते भी थे कि यह लड़का सच्चा समाजसेवी है। उनकी इन तारिफों से ही सत्यानन्द घर की सारी शिक्वा-शिकायत को भूल जाता था। मगर नोमिनेशन के लिए लाये हुए उसके फार्म में उसके बड़े भाई ने चुपचाप अपनी पत्नी का डिटेल भर कर नोमिनेशन के दिन यह कहा कि तुम अगली बार चुनाव लड़ना, फार्म अपनी पत्नी के नाम से भर दिए हैं। तब सत्यानन्द को ऐसा लगा कि उसके पैरों के नीचे से किसी ने जमीन खींच लिया है। हालांकि वह चाहता तो दूसरा फार्म लाकर भी अपना नोमिनेशन करवा सकता था। जन समर्थन तो उसके पक्ष में था ही। लेकिन उसे जैसे ही यह पता चला कि उसके बड़े भाई ने यह सब अपनी माँ के कहने पर किया है, सत्यानन्द का सारा जोश ठण्डा पड़ गया था। घर के अन्दर होने वाले झगड़ों की बातें बाहर आने से उसकी बदनामी न हो, इसके लिए उसने न चाहते हुए भी अपने बड़े भाई का ही साथ दिया था। इसके लिए उसका मकसद सिर्फ़ इतना ही था कि उसे अपना दुश्मन समझने वाली उसकी माँ खुश हो जाये। चुनाव तो हुआ लेकिन वोटिंग के दिन सबके सामने अपने बड़े भाई के द्वारा अपमानित होने के कारण गाँव की मन्दिर में जाकर फूट-फूट कर रो रहे सत्यानन्द जी के साथ किये गये छल की बात जानते ही उनकी समर्थित उम्मीदवार समझ कर उनकी भाभी को वोट देने वाले लोग उसी गाँव के अन्य उम्मीदवार को वोट देने लगे और मतगणना होने पर उनके नाम पर वोट पाने वाली उनकी भाभी मात्र १२५ वोटों से हार गई थी। जिसका ठीकरा भी सत्यानन्द जी पर ही फोड़ते हुए उनके साथ दूबारा मार-पीट शुरू कर दिया गया था। उनके हिस्से की जमीन बेच कर उन्हें घर से भगा दिया गया था।
सत्यानन्द के पिता के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद 35 साल पहले साधुओं के द्वारा कही गई बातों को ध्यान में रख कर उसे अपने पिता के आस-पास फटकने भी नहीं दिया गया था। एक दिन उसके पिता जब खुद ही सत्यानन्द के कमरे में आ गए थे तब उसे अपने बड़े भाई का कोपभाजन होना पड़ा था। आखिर उसकी अनुपस्थिति में ही सत्यानन्द के पिता की मृत्यु हो गई। मगर उसकी माँ जो जीवित है, वह 35 साल पहले कहे गए उस साधु की बातों को याद कर के आज भी यही मानती है कि तलवार से गर्दन काट कर उसका मंझला लड़का ही उसकी हत्या करेगा। इस भय से वह हमेशा उससे दूर रहती है और उसे मरवाने के लिए हमेशा नये-नये जाल बुनती रहती है। जबकि उसकी माँ भय के कारण समय से पहले ही न मर जाए, इसके लिए अब सत्यानन्द भी अपनी माँ से जानबूझकर दूर रहता है। हालांकि इस बदनसीबी के कारण उसे जब भी एकांत मिलता है अफर-अफर कर खूब रोता है।
मैं देख चुका हूँ कि माँ-बाप की सेवा करने के बाद भी आशिर्वाद नहीं मिलता है। जिसके नसीब में दुख लिखा है, उसे चाह कर भी सुख नहीं मिल सकता है। हमारे किस्मत की चाभी सिर्फ परमात्मा के हाथों में है। सेवा करनी है तो दीन-दुखी और जरूरतमंदों की करनी चाहिए। ऐसे लोगों के हृदय से निकला आशिर्वाद ही फलदायी होता है। लेकिन माता-पिता के द्वारा दिया गया श्राप भी जरूर लगता है।
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित आदि ग्रन्थ महाभारत के वन पर्व में स्थित एक श्लोक के अनुसार भूनेत्र के नाम से प्रसिद्ध महातीर्थ "कटाक्ष" वह स्थान है जो सभी पापों को धो देता है। इस महातीर्थ को धारण करने वाले राज्य को लोग कठ गणराज्य के नाम से भी जानते थे। हालांकि कठ गणराज्य का अस्तित्व तो नहीं रहा मगर पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित चकबल में कल्लर कहार मार्ग पर वह सरोवर आज भी है जहां एक यक्ष के सवालों का जवाब दिए बगैर सरोवर का पानी पीने का प्रयास करने पर पाण्डवों के भाई भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव अचेत कर दिये गये थे। बाद में युधिष्ठिर ने जब यक्ष के सभी सवालों का जवाब देकर यक्ष को सन्तुष्ट कर दिया तभी उस सरोवर का जल पी सके थे। यक्ष के कहने पर जिस सरोवर के अमृत तुल्य जल का छिड़काव कर के युधिष्ठिर ने अचेत पड़े अपने भाईयों की चेतना वापस लाये थे वही सरोवर है चकबल में कटास नामक तीर्थ स्थान में स्थित यह सरोवर। हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल कटास में प्रवेश करते ही "कटास राज चौक, श्री कटास राज मन्दिर और कटास राज अमृत कुण्ड" का बोर्ड दूर से ही दिखाई देता है।
कुछ जगहों पर पाकिस्तान सरकार के द्वारा लगवाये गए साइनबोर्ड को आप भी देख सकते हैं कि जिसमें लिखवाये गये सन्देश पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू के बजाए भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी और नये युग की अन्तरराष्ट्रीय भाषा में लिखे हुए हैं। ऐसा इसलिए लिखा गया है ताकि भारतीय पर्यटक! खासकर राजस्थान से आने वाले पर्यटक उन सन्देशों को आसानी से समझ सकें।
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एक साइनबोर्ड में स्पष्ट लिखा हुआ है - "महान और पावन तीर्थ धाम श्री कटासराज जी की यात्रा करने के लिए आने पर पाकिस्तान वक्फ़ बोर्ड की ओर से आपका स्वागत है।"
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उस पवित्र तीर्थ धाम के पास वक्फ़ बोर्ड के द्वारा लगवाये गये अन्य साइनबोर्ड में हिन्दी, इंग्लिश और उर्दू भाषा में भी लिखवाये गये सन्देशों से श्री कटास राज तीर्थ स्थान के बारे में पर्यटकों को जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने श्री कटासराज तीर्थ को भगवान शिव का तीर्थ माना है।
🗺️ (कटासराज मन्दिर में स्थित भगवान शिव जी की प्रतिमा और तस्वीरें)
कहते हैं कि माँ पार्वती! अपने पिता प्रजापति दक्ष के द्वारा अपने पति का अपमान नहीं सह पाने के कारण यज्ञ कुण्ड में कूद कर जब सती हो गयी, तब भगवान शिव के आँखों में छलक आये अश्रुबुन्द जिन दो जगहों पर गिरे थे, वहाँ पर पवित्र अमृत कुण्ड बन गये थे। भगवान शिव की आँखों में छलक आये आँसू के एक बुन्द राजस्थान के अजमेर नामक जिस भारतीय क्षेत्र में गिरा था वहाँ पर निर्मित पुष्कर सरोवर! तीर्थ स्थान पुष्कर राज के नाम से प्रसिद्ध हुआ तो भगवान शिव जी की आँखों से दूसरा अश्रुबुन्द जिस स्थान पर गिरा था, उस स्थान पर बना हुआ सरोवर "तीर्थ कुण्ड श्री कटाक्ष राज" के नाम से प्रसिद्ध हुआ लेकिन अब अपभ्रंश के कारण कटास राज कहलाता है।
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शिव जी के नेत्रों से गिरे दो अश्रु बन्दों से बने दोनों तीर्थ कुण्ड 1947 ईस्वी में हुए भारत के बंटवारे के बाद अब दो अलग-अलग देशों में स्थित है।
शास्त्रों में कटास-राज और पुष्कर-राज नामक तीर्थ स्थानों को भूनेत्र अर्थात धरती का नेत्र कहा गया है। लेकिन ऐसा क्यों कहा गया इसके लिए कौशिक कंसल्टेंसी इंटेलीजेंस ब्यूरो के द्वारा शोध किया जा रहा है। यजुर्वेद में श्री कटासराज धाम को सारस्वत प्रदेश में स्थित ब्रह्मावर्त कहा गया है। इस तीर्थ की महानता का प्रमाण आदि ग्रन्थ महाभारत में वर्णित उस घटना से मिलता है, जिसके बारे में लोगों की यह मान्यता है कि कटास-राज अमृत कुण्ड जो पहले एक आम सरोवर की तरह दिखाई देता था, उसी सरोवर के किनारे पाण्डवों के बड़े भाई युधिष्ठिर और उस सरोवर की रक्षा करने वाले यक्ष के बीच वह बहुचर्चित संवाद हुआ था, जिसके कारण यक्ष के द्वारा पूछे गए सभी सवालों के जवाब देकर युद्धिष्ठिर ने न केवल धर्मराज की पदवी पाया था, बल्कि इसी कटास राज सरोवर के पवित्र जल का छिड़काव कर के अचेत अवस्था में पड़े हुए अपने चारों भाईयों को पुनर्जीवित भी किया था। पाण्डवों के साथ घटित उस अविष्मरणीय घटना के कारण "कटास राज सरोवर" एक महान तीर्थ स्थल के रूप में संसार में अपनी सुगन्ध फैलाने लगा।
पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के जिला चकबल में कटाक्ष तीर्थ स्थल के पास बसने वाला कटास नामक वह प्राचीन गाँव आज भी है जहां पर स्थित हिन्दुओं के महान तीर्थ "कटास राज अमृत कुण्ड" 1947 ईस्वी में भारत का बंटवारा होने से पहले हिन्दु धर्म का मुख्य केन्द्र था। भारत का बंटवारा होने से पहले कटास राज मन्दिर के प्राङ्गण में हिन्दी और संस्कृत का महाविद्यालय भी स्थित था, जिसे बंटवारे के बाद बन्द करके स्थायी रूप से खत्म कर दिया गया है। लेकिन उस तीर्थ स्थल पर कटास राज का प्राचीन मन्दिर, श्री कटास राज अमृत कुण्ड के नाम से विख्यात सरोवर और महाविद्यालय के अवशेष अभी भी बचे हुए हैं। जिसकी देख-रेख पाकिस्तान वक्फ़ बोर्ड कर रही है।
इस तीर्थ स्थल हिन्दुओं के कम आवागमन के कारण अब श्री कटास राज कुण्ड के पानी का इस्तेमाल नहीं होने से उस कुण्ड के जल सतह पर सर्वत्र काई जम गया। इसके कारण भगवान शिव के प्रति आस्थावान लोगों के उस तीर्थ स्थान का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जिसे समय रहते नहीं बचाया गया तो इंसानियत की शुरुआत जिस एक परिवार से हुआ था उसका आखिरी अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा। फिर जाति, धर्म और समुदाय के नाम पर लड़ने वाले लोगों को कैसे यकीन दिलाया जाएगा कि सभी धरती वासी एक ही परिवार के सदस्य हैं?
देखें कहाँ है कटास राज मन्दिर👇
🏚️ Katas Raj Temples
PXF2+HMR, Kalar Kahar Rd, Katas, Chakwal, Punjab, Pakistan
https://maps.app.goo.gl/4T9j3hH2S5xtmeEs6
अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम के तहत बहाल किये जाने वाले जवानों की शुरुआती वेतन 21,000/- रुपये होगी। जो सालोंसाल बढ़ते हुए 28000/- रुपये तक हो जाएगी। अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम नामक योजना के तहत बहाल होने वाले जवानों का वेतन दूसरे साल 23,100/- रुपये और तीसरे साल 25,580/- रुपये हो जाएगा। इस तरह से अपनी जरूरी आवश्यकतााओं में सेे कटौती करने के बावज़ूद ताउम्र 1,00,000 (एक लाख) रुपये की भी जुगाड़ नहीं कर पाने वाले परिवार के लोग भी अपने चार वर्षीय सेवा काल के दौरान 11,72,160/- रुपये तो वेतन के रूप में ही कमा लेंगे। इसके अलावा मात्र चार वर्षीय नौकरी पूरा कर के 24 वर्ष की आयु में अपना आगे का भविष्य अपनी इच्छा के अनुसार निर्धारित करने के लिए सेवानिवृत्त कर दिये जायेंगे। चार वर्षों की अवधि में नागरिकता के सभी अधिकारों और कर्तव्यों की शिक्षा लेने के बाद पेंशन के रूप में 11 लाख 71 हजार रुपये भी एकमुश्त प्राप्त करेंगे। जिसका इस्तेमाल अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए या अपना व्यापार शुरू करने के लिए कर सकेंगे। सरकार की इस योजना में कोई बुराई नहीं है। लेकिन कुछ लोगों का गिरोह इसके विरोध में रेल की पटरियां उखाड़ने और तोड़-फोड़ करके देश के संसाधनों को बर्बाद करने का काम कर रहे हैं, जो सर्वथा अनुचित है।
केन्द्र सरकार की अग्निपथ योजना के तहत बहाल होने वाले युवाओं को कितनी कमाई होगी उसे संलग्न चार्ट से समझ सकते हैं। :
पहला साल- 21,000×12= 2,52,000
दूसरा साल- 23,100×12= 2,77,200
तीसरा साल- 25,580×12= 3,06,960
चौथा साल- 28,000×12= 3,36,000
कुल वेतन का योग 11,72,160 रुपये
रिटायरमेंट राशि 11,71,000 रुपये
कुल कमाई राशि का योग 23,43,160
मात्र चार वर्षों की सेवा अवधि में ही इतनी कमाई करने का अवसर देने वाला जॉब आर्मी की है। रहना-खाना, आर्मी का मुफ्त में प्रशिक्षण और इलाज़ आदि कई सुविधायें फ़्री है। मतलब यह है कि जो उम्र गलियों में क्रिकेट खेलने, नुक्कड़ों पर चाय और सिगरेट पीने में निकल जाती है, उन 4 सालों में 23 लाख 43 हज़ार 160 रुपये कमाने का सुअवसर भारत सरकार दे रहा है।
मात्र 17 से 23 साल की उम्र के लोगों के लिए यह योजना यूक्रेन और रूस में चल रहे युद्ध की विषम परिस्थितियों से निपटने के लिये यूक्रेन के सभी नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण की अनिवार्य शिक्षा कानून को देख कर शुरू किया है। आज विश्व में जो हो रहा है उससे निपटने के लिए इस तरह की योजना की आवश्यकता भी थी। मगर भारत को तोड़ने की साजिश करने वाले लोगों के उकसावे पर केन्द्र सरकार के द्वारा शुरू किये गये अग्निपथ योजना के विरोध में तोड़-फोड़ कर रहे हैं। अतः आप लोगों से अपील है कि देश विरोधी लोगों के उकसावे में आकर अपने ही हाथों अपना नुकसान नहीं करें। बल्कि अपने बच्चों को भारतीय सेना को ज्वाइन करने के लिए प्रेरित करें। विश्व मंच पर सबसे ज्यादा प्रसिद्ध प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी केन्द्र सरकार के पैसों से 4 वर्षों तक आपको आर्मी की ट्रेनिंग देंगे, साथ मे इतने सारे पैसे भी। जॉब वैसे भी नहीं है, बारवीं या ग्रेजुएशन करने के बाद सीधे अग्निपथ के रास्ते पर चले जाइए, यही आपका भविष्य है और हमारा भी।
उसके बाद 24-25 की उम्र में रिटायरमेंट के पैसों से अपना बिजनेस शुरू करें लीजिएगा,या इंडियन आर्मी की ट्रेनिंग के साथ गल्फ़ तो है ही, आर्मी का अनुशासन आपके बहुत काम आएगा। आपकी वर्तमान लाइफ जैसी अभी चल रही है, उससे बेहतर तय है। तो आप अग्निपथ योजना के विरोध का हिस्सा मत बनिए बल्कि ये समझिए कि, आप के लिए बल्क में, आर्मी तक नहीं पहुँचने देने का जो आरक्षण था अब वह ख़त्म हो चुका है।
अपना भविष्य सुरक्षित कीजिए और सोचिए 24 के उम्र में 0 से आर्मी ट्रेनिंग के साथ कुल मिला कर 11 लाख रूपये सैलरी के रूप में मिलने वाला पूरा पैसा अगर आप ख़त्म भी कर देते हैं तो रिटायरमेंट के वक़्त मिलने वाला 11 लाख 71 हज़ार रुपया कम नहीं है।
देश में 50% लोग ऐसे हैं जो पूरी उम्र में इतना पैसा नहीं कमाते जो 4 साल में अग्नीपथ से आयेंगे।💞
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एक निजी जासूसी एजेंसी आपके लिए व्यक्तिगत जांच से सम्बन्धित मामलों की जिम्मेदारी को सम्भालती है। एक व्यक्ति के रूप में अदालती मामलों में पड़ने पर आपको भी केस लड़ने की आवश्यकता हो सकती है। शादी, नौकरी या ब्रेकअप के बारे में निर्णय लेने के लिए आपको व्यक्तिगत डेटा या जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता हो सकती है। किसी कारणवश पारिवारिक, सामाजिक या कानूनी सहायता नहीं मिलने पर किसी भी व्यक्ति को जटिल समस्याओं या मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में एक जासूसी एजेंसी और न्यूज़ एजेंसी सहित सामाजिक संगठनों की भी मदद की आवश्यकता होती है। जो एकमात्र कौशिक कंसल्टेंसी इंटेलीजेंस ब्यूरो (केसीआईबी) ही दे सकती है। क्योंकि यह एजेंसी 20 वर्षों से भी अधिक समय से व्यक्तिगत जांच और परामर्श सहित हर तरह की सहायता और सेवा एक जिम्मेदार संगठन की तरह दे रही है। संलग्न ट्रैक रिकॉर्ड आपकी मदद करने की हमारी क्षमता के बारे में बताता तो है ही हमारे प्रति लोगों के विश्वास को प्रमाणित भी करता है। उन क्षेत्रों को देखें जहां केसीआईबी के संस्थापक प्रसेनजित सिंह "स्वामी जी" ने अपनी विशेष पहचान बना ली है। अपने इन्हीं विशेषताओं के कारण ये सहजता पूर्वक आपके समक्ष उत्पन्न सभी तरह की समस्याओं के जांच-पड़ताल करवा सकते हैं। :
पारिवारिक
सामाजिक
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व्यवसायिक
आध्यात्मिक
इंफार्मेशन सर्विस एण्ड न्यू्ज़ एजेंसी एक्टिविटीज के लिए भारत सरकार के द्वारा पंजीकृत यह संगठन देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण मानसिक यंत्रणा से जूझ रहे लोगों को सुरक्षा और न्याय दिलाने के लिए पीड़ित लोगों को जन-जागरूकता हेतु गठित सामाजिक संगठनों की सहायता भी दिलवाता है। साथ ही प्रेम सम्बन्धों में असफलता, पारिवारिक तनाव, सम्पत्ति विवाद, झूठे केस-मुकदमों और वास्तुदोष आदि मामलों में तांत्रिक अनुष्ठानों के द्वारा अलौकिक शक्तियों से कोई ऐसा चमत्कार या करिश्मा भी करवा देता है जिसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते हैं। इस कम्पनी ने ऐसे कई काम करवायें हैं जिसके बारे में संलग्न ट्रैक रिकॉर्ड से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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