शनिवार, 6 जून 2026

जनता का विश्वास खोती जा रही बिहार पुलिस


जब जदयू प्रवक्ता संजय सिंह के आवासीय परिसर में अपने टीम के साथ प्रसेनजित सिंह (ब्राउन कलर के ब्लेजर में) मगर संजय सिंह ने भी इस मामले में हाथ खड़े कर दिए थे।


यह संस्मरण है उस समय की जब अपहृत बेटी की बरामदगी के लिए दर-दर ठोकरें खा रही आँगनबाड़ी सेविका की मदद पुलिस-प्रशासन और नेता भी नहीं कर सके तब कौशिक कंसल्टेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो ने हाजिर करवाया था अपहृता को। 

KCIB, Patna : 
बात उन दिनों की है जब Winging of Scapula Literal नामक असाध्य बिमारी से पीड़ित होने के कारण बेरोजगार होकर घर में पड़ा रहता था। लेकिन Facebook और WhatsApp पर active रहता था। एक दिन अचानक किसी अज्ञात श्रोत से आये व्हाटस्ऐप मैसेज़ से पता चला कि एक राजपूत परिवार की बेटी पन्द्रह दिनों से लापता है, लेकिन अभी तक राजीवनगर थाना के पुलिस इंस्पेक्टर ने FIR तक दर्ज नहीं किया है। जबकि वह इंस्पेक्टर भी राजपूत जाति का ही है। उस खबर ने मुझे अन्दर तक हिला दिया था और पता नहीं कहां से मेरे मृतप्राय शरीर में फिर से जान फूंक दिया था। अपनी बिमारी के कारण पत्रकारिता के कार्य छोड़ कर घर में पड़े-पड़े स्वस्थ्य होने की कामना करते हुए दिन गुजारने के बजाय उस गुमशुदा बेटी का पता लगाने के लिए एक इंवेस्टीगेटीव रिपोर्टर की तरह इंवेस्टीगेशन एण्ड सर्च का अपना पसन्दीदा काम शुरू करना पड़ा था। कानूनी सपोर्ट के लिए भारत सरकार द्वारा पंजीकृत Kaushik Consultancy Intelligence Bureau नामक मेरी रजिस्टर्ड प्रतिष्ठान और पत्रकारिता का अनुभव था ही। फिर क्या था उस अज्ञात लड़की की तलाश करने के लिये मैंने एड़ी-चोटी एक कर दिया था। 

सबसे पहले जिस व्हाट्सएप ग्रुप से मुझे इसकी जानकारी हुई थी उसके संचालक से सम्पर्क किया लेकिन उसने इस घटना के सम्बन्ध में कोई जानकारी दिये बगैर सामाजिक संगठनों और समाजसेवियों को मृत घोषित करते हुए इस घटना पर अफसोस जताने के अलावा और कोई जानकारी नहीं दे पाया। उस सन्देश को उसके व्हाटस्ऐप ग्रुप पर फारवर्ड करने वाला व्यक्ति भी नहीं जानता था कि वह पीड़िता कौन और कहाँ की है। तब मात्र इन्सानियत के नाते मेरे मन में उस परिवार की मदद करने की इच्छा जागृत हुई थी और अपने मित्रों सहित राजीव नगर थाना के कर्मचारियों की मदद से उस मामले की सच्चाई जानने के लिए पीड़ित परिवार के घर पर पहुंच गया था। वहां जाने पर पता चला कि पीड़िता 60-65 साल की विधवा हैं। और पटना में अपने 17 वर्षीय बेटे के साथ रहती हैं। जबकि उनकी बेटी रचना सिंह जो पन्द्रह दिनों से लापता है बंगलोर में रहकर कम्प्यूटर इंजीनियरिंग का कोर्स कर रही थी। लेकिन कोरोना के कारण अपनी माँ के पास आ गयी थी। जिस दिन शाम में फल-सब्जी खरीदने के लिए घर के पास ही स्थित मण्डी में गई थी उसी दिन से गायब है और बार-बार बेटी की तलाश करने में मदद करने की गुहार लगाने पर भी पुलिस-प्रशासन उनकी मदद नहीं कर रही है।

उनकी आपबीती सुनने के बाद मैंने उनकी मदद करने का आश्वासन देते हुए इंवेस्टीगेटर और क्राइम रिपोर्टर के अपने पुराने अनुभवों का इस्तेमाल करने का निर्णय ले लिया था। इस कार्य में जहाँ भी जरूरत होती वहाँ एक साथ चलने के लिए मेरे दोस्तों ने मुझे वचन दिया था। क्योंकि मैंने अपनी बीमारी के कारण पिछले चार वर्षों से अपनी बाइक चलाना छोड़ दिया था और मँहगाई के इस युग में भाड़े की गाड़ी रिजर्व कर के इंवेस्टिगेटर का काम करना मेरे लिए सम्भव नहीं था। चुकी पीड़िता का घर मेरे घर से लगभग 18 किलोमीटर दूर था। वह भी ऐसे जगह पर जहाँ पहुंचने के लिए नीजी वाहन से आवागमन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। उस महिला की मदद करने के लिए मामले की प्राथमिक जानकारी एकत्र करना भी जरूरी था। जो सम्बन्धित अधिकारियों और आरोपित लोगों के परिजनों से मिले बगैर सम्भव नहीं था। इस कार्य में दो-तीन दिनों तक अपना समय देने के बाद जब मुझे ऐसा महसूस हुआ कि पीड़ित लोग सच्चाई को छुपा रहे हैं और फरारी के मामले को कभी गुमशुदगी तो कभी अपहरण का मामला बता रहे हैं तो उस मामले को बेकार का लफड़ा कहते हुए मेरे मित्रों ने उस मामले में मेरा साथ देने से मना कर दिया था। ऐसे में जिस अधिकारी से मिलने के लिए मैंने पहले ही अप्वाइंटमेंट ले रखा था उनसे मिलने के लिए मुझे न चाहते हुए भी अपनी बाइक खुद चलानी पड़ी थी। जबकि डॉक्टरों ने मुझे वजनी सामान उठाने के लिए साफ़ कर मना कर रखा था।

इसके लिए अपने पूर्व निर्धारित समय पर मैं तो आई.जी ऑफिस में पहुंच ही गया था लेकिन जिनकी सहायता करने के लिए मैंने वह मीटिंग निर्धारित की थी उन्होंने फ़ोन कर के आग्रह किया था कि उनके मामले में मैं जिस अधिकारी से भी मिलुं अपने साथ उन्हें भी जरुर रखूं। उनके इस जिद के कारण निर्धारित समय पर आई.जी के कॉल करने पर भी उनसे भेंट न कर पीड़ित दुखियारिन के आने का इंतजार करता रहा। जब वह पहुंची तब वे आईजी हमारे साथ होने वाली मीटिंग कैंसिल कर के अपने विभागीय मीटिंग में व्यस्त हो गये थे। इसके कारण उस महिला ने इतना हंगामा किया कि आई.जी असीस्टेंट अशोक कुमार सिन्हा ने उन्हें सरकारी कार्य में बाधा उत्पन्न करने के आरोप में गिरफ्तार करने की धमकी देते हुए अपने ऑफिस से खदेड़ दिया था। आईजी ऑफिस के लोग अपने जगह पर सही थें। उन्होंने मदद करने के लिए मुझे हर तरह का आश्वासन दिया था। लेकिन वह महिला पूर्व निर्धारित समय पर नहीं आकर खुद लापरवाही की थी। इसके बावजूद आई जी संजय कुमार सिंह ने 05:00-06:00 बजे के बीच मिलने का दूबारा समय दिया। 

तब तक गाँधी मैदान थाना और नजदीकी बैंक से सम्बन्धित अन्य लफड़ों को सुलझाने के लिए भी मुझे चलने का आग्रह करते हुए मेरी बाइक पर बैठने लगीं। तब मैंने अपनी बीमारी की जानकारी देते हुए उन्हें बैठाकर बाइक नहीं चला पाने की मजबूरी बताते हुए चार वर्षों के बाद पहली बार उनकी मदद करने के लिए ही बाइक निकालने के कारण और वह बाइक चलाने के कारण बढ़ते जा रहे दर्द की जानकारी भी उन्हें देते हुए माफ़ी माँग लिया था। लेकिन मेरी मजबूरी को अनसुना कर के मेरी बाइक पर जबरन बैठ कर गाँधी मैदान थाना आदि अन्य जगहों पर चलने के लिए जिद करने लगी थीं। मैंने पहली बार एक अनजान महिला को इस तरह जिद करते हुए देखा था। जिसे उनका भोलापन समझ कर न चाहते हुए भी उनको समझाने की कोशिश करना छोड़ दिया और वे जहाँ-जहाँ कहीं वहाँ-वहाँ उनको ढ़ोता रहा। देर रात घर लौटते ही मुझे पेन किलर लेना पड़ा। इसके बावजूद रात भर मुझे नींद नहीं आई। सुबह होने पर मैने महसूस किया कि मेरा हाथ ऊपर नहीं उठ पा रहा है। जरा सी हरकत करने पर भी दर्द से तिलमिला उठता हूँ। तब गुमशुदा लड़की के बारे में पता करने के लिए खुद ही फिल्ड में न जाकर सोशल वर्क और पत्रकारिता से जुड़े अपने मित्रों की मदद से ऑनलाइन छानबीन करवाता रहा। जब भी दर्द में कुछ कमी महसूस करता खुद भी अपनी बाइक लेकर निकल जाता था। संयोगवश मेरी मेहनत रंग लाई। मैं अपहरणकर्ता के रूप में आरोपित मुख्य व्यक्ति से सम्पर्क करने में सफल हो गया और उस पर कोर्ट में हाजिर होने के लिए दबाव बनाने लगा। तब तक उसके लोकेशन की सूचना अपने मित्रों को देकर उस पर चौतरफा दबाव बनाने लगा तब बाध्य होकर उसने मुझे स्वयं सूचित किया कि मैं स्वयं सरेण्डर करने के लिए तैयार हूँ। इसके लिए अपने वकील से बात कर रहा हूँ।

संयोगवश एक दिन अचानक अयोध्या में बैठे मेरे ग्रुप का ही सेतु सिंह नामक युवक ने मुझे फ़ोन कर के बताया कि मुझे अभी-अभी सूचना मिली है कि अपहृत युवती रचना सिंह को लेकर फरार चल रहा युवक आज कोर्ट में सरेण्डर करने वाला है। इस सूचना के मिलते ही अपहरणकर्ता संजीत कुमार यादव के मुहल्ले में रहने वाले मेरे एक और मित्र ने कॉल कर के सूचित किया कि संजीत और रचना एक घण्टे के अन्दर सीविल कोर्ट में सरेण्डर करने वाला है, वहाँ जल्दी पहुंचिये। इस कॉल के आते ही मुझे पुनः अपनी बाइक से ही कोर्ट की ओर निकलना पड़ा था। इसलिए नहीं कि अपहृत युवती के परिजनों से मुझे प्रेम था और इसलिए भी नहीं कि अपहरण के लिए आरोपित युवक से मेरी दुश्मनी थी। बल्कि इसलिए क्योंकि मेरे कारण कई लोग खुल कर इस मामले के उद्भेदन के लिए मेरी खुल कर मदद कर रहे थे। मेरे वहाँ नहीं जाने से मैं खुद उन लोगों की नजरों से गिर जाता। कोर्ट में पहुंचते ही मैंने देखा कि इस मामले में मेरा साथ दे रहे 7-8 लोग वहाँ पहले ही पहुंच चुके थे। अपहृत कही जा रही युवती जो स्वयं प्रेम प्रसंग के चक्कर में स्वेच्छा से अपने घर से फरार हुई थी, वह भी महिला पुलिसकर्मियों के साथ कोर्ट के बरामदे में अपने कॉल का इंतजार कर रही थी। मैंने उससे मिल कर उसके प्रेमी के बारे में जानकारी देते हुए यह बताया कि वह पहले से ही शादीशुदा और चार बच्चों का बाप है। जिस तरह से पहली पत्नी और बच्चों से पिछले चार वर्षों से कोई मतलब नहीं रखता है उसी तरह किसी और के मिलते ही तुम्हें भी छोड़ देगा। अतः कोर्ट में बयान देते समय यह जरूर कहना की "मैं स्वेच्छा से इनके साथ जरूर भागी थी लेकिन जब विवाह करने के बाद मुझे पता चला कि यह पहले से शादीशुदा और 3-4 बच्चों का बाप है तब मुझे खुद के ठगे जाने का अहसास हुआ। अतः अब इसके साथ नहीं बल्कि अपनी माँ के साथ रहना चाहती हूँ। इसे इसकी धोखाधड़ी करने की सजा मिलनी चाहिए।" बस इसी बयान के आधार पर वह लड़की उसकी माँ को सौंप दी गई। इस तरह एक महीने के अन्दर जिसके साथ उनकी बेटी स्वयं भाग कर गयी थी उससे सम्पर्क स्थापित करने और उन लोगों को समझाने के बाद उनकी बेटी को कोर्ट में हाजिर करवा कर उसके परिजनों तक पहुंचाने का भी काम पूरा कर दिया था।

इस दौरान चार वर्षों से बेरोजगार होकर घर में बैठने की मजबूरी के बावजूद तमाम सरकारी सुविधाओं से भी वंचित होने के बाद भी अपनी जमा पूँजी निकाल-निकाल कर जिस विधवा की सहायता करने के लिए भाग-दौड़ करता रहा उसने अपने अन्य लम्बित मामलों के निपटारे के लिए भी मुझसे मदद करने का आग्रह करने लगी तब मैंने उन्हें स्पष्ट कह दिया कि "मैंने लड़की के अपहरण का मामला समझ कर आपकी मदद किया था।" मुझे आपके कारण ही वह बाइक चलाना पड़ा जिसके कारण मेरी बीमारी फिर से बढ़ गयी है। इसके इलाज के लिए पैसे की जरूरत है। अतः मैं आपका काम तो करवा दुंगा लेकिन अब इसके लिए आपको फी देना होगा। इस मामले से पहले मेरा यही प्रोफेशन था और इस तरह के कार्यों के  लिए मैं भारत सरकार के द्वारा रजिस्टर्ड हूँ। तब उन्होंने मुझे वचन दिया की आपकी जो भी फी होगी ले लीजिएगा लेकिन मेरा काम करवा दीजिए। 

उस पीड़िता की बेटी की तलाश करने के चक्कर में भागदौड़ और लोगों को मैनेज करते-करते मेरे एकाउण्ट के लगभग सभी पैसे खत्म हो गये थे। इसके कारण मैंने उनसे एडवांस में कुछ पैसे जमा करने का आग्रह किया तो वे बहाने बना कर चली गई थीं। तब मैंने भी अपने स्वास्थ्य कारणों से कहीं आना-जाना बन्द कर दिया था। मुझे बार-बार फोन कर के घर में आकर भेंट करने के लिए बुलाने पर भी जब मैं विधवा महिला अनामिका किशोर के यहाँ नहीं गया तब एक दिन उनका बेटा मेरे घर में आकर माँ की मदद करने का आग्रह किया। तब न चाहते हुए भी उनकी माँ की कई लम्बित मामलों की पैरवी करने के लिए लगातार दो-तीन दिनों तक समय दिया। लेकिन जैसे ही पैसे की बात करता वे बहाने बनाने लगती। मैं समझ गया था कि वे लोग जरूरत से ज्यादा चालाक हैं। यही कारण है कि हर जगह उनका आसानी से होने वाला काम भी फँस जाता है। चुकि वह महिला मेरे पूर्वजों के वंशजों के द्वारा बसाये गये गाँव मसाढ़ी की ही निकल गई थी जिसके कारण मैं उन पर पैसे के लिए दबाव नहीं बना पा रहा था। मेरी तरह उनकी बेटी भी कौशिक गोत्रीय परिवार की ही सदस्य थी इसके कारण जिस तरह मैंने उनका खुल कर मदद किया इसी तरह उन्हें भी तो मेरी परेशानी समझनी चाहिए थी। 

एक दिन उनके जिद के कारण मुझे इतनी भीड़-भाड़ वाली गली में बाइक लेकर जाना पड़ गया जहाँ अपने दाहिने हाथ में हो रहे दर्द के कारण बाइक की हैण्डल नहीं सम्भाल पाया और दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। उसके कारण मेरी गाड़ी और हेलमेट तो क्षतिग्रस्त हुआ ही पहले से ही Winging of scapula से सबसे ज्यादा पीड़ित दाहिने हाथ में ही दुबारा चोट लगने से हमारी परेशानी और बढ़ गई थी। जिसका इलाज़ करवाने के लिए डॉक्टर का फी देने तक का पैसा अपने पास नहीं होने के कारण जब मैंने उस महिला से उनकी मदद करने के लिए किया गया खर्च माँगने लगा तब मोच बैठाने वाले से दिखवा देने की जिद कर के मुझे Pain Relief Spray लाकर दे दी। जबकि मैं जानता था कि मोच से नहीं बल्कि किसी और बीमारी से परेशान था और चोट लगने के कारण मेरी बीमारी विकराल रूप धारण करने वाली थी।

उस दुर्घटना के बाद मैं उनके बुलाने पर भी जब दुबारा उनकी मदद करने से इंकार कर दिया था तब एक दिन वे खुद हमारे घर पहुंच गई और क्षेत्रीय होने के साथ हमारी समगोत्रीय होने का वास्ता देते हुए कहने लगी कि "आप ही न कह रहे थे कि आपकी बेटी! मेरी भी बेटी है। अतः किसी भी तरह की परेशानी होगी तो मुझे जरूर बताइएगा। जहाँ तक होगा आपकी मदद जरूर करेंगे। फिर ऐसा क्या हुआ कि आप मेरा कॉल रीसिव करना भी छोड़ दिये? बिना मेरी सूचना के मेरे बैंक एकाउण्ट में से जो पैसे गायब हो गए हैं, सिर्फ़ उसकी रिकवरी करवा दें। फिर आप जितनी कहेंगे उतनी फी आपको दे देंगे।" इस पर मैं उन्हें बार-बार समझाता रहा कि आपके एकाउण्ट का पैसा किसी और ने नहीं बल्कि आपकी अपनी बेटी ने ही निकाला है। ऐसे में बैंक पर दबाव देना उचित नहीं है। लेकिन वे मानने के लिए तैयार नहीं हुई।... और अगले दिन बैंक मैनेजर पर इसके लिए दबाव बनाने का वचन लेने के बाद ही मेरे घर से वापस गयी। मुझे उनकी गिड़गिड़ाहट पर तरस खाकर खुद बीमार होने पर भी उनकी मदद करने के लिए जाना पड़ता था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी बीमारी और बढ़ गई है तथा मैं फूल टाइम बेडरेस्ट के लिए मजबूर हो गया हूँ।

अब मसाढ़ी के उदय किशोर सिंह की विधवा पत्नी अनामिका किशोर अपनी बेटी की बरामदगी के बाद मुझे इनाम या सम्मान देने के बजाय यह आरोप लगा रही हैं कि मैं उनकी बेटी को भगा कर ले जाने वाले युवक का ही साथ दे रहा हूँ। इसी के कारण उन लोगों के द्वारा बार-बार बुलाने पर भी उन लोगों के पास नहीं जा रहा हूँ। जबकि हकीकत यह है कि मैं वाकई में बहुत ज्यादा परेशान और तनाव में हूँ। अपने स्वास्थ्य कारणों से ही घर से नहीं निकल पा रहा हूँ।

मैं हनुमान तो हूँ नहीं जो सीना चीड़ कर दिखा दूँ। आज तक आप लोगों से अपनी बीमारी के बारे में न बता कर सामाजिक गतिविधियों में इसलिए मग्न रहता था ताकि अपनी जिन्दगी को जी भर के जी सकूं। अन्यथा बीमारी को याद कर-कर के निर्दयी और निष्ठुर हो चुके लोगों से चर्चा करने से मानसिक तनाव और बढ़ेगा ही। जिसके लिए अपने स्वास्थ्य की परवाह किये बगैर तन, मन, धन सब कुछ लगा दिया जब वैसे लोग भी धोखेबाज़ निकल गये तो समाज के अन्य लोगों से क्या आशा करूं?

इसी तरह जब फत्तेपुर वासी सतीश जी की माँ पटना के NMCH में इलाज़रत थे। उन्हें डॉक्टरों का सहयोग नहीं मिल पा रहा था, तब सतीश जी ने Bargayan Warriors नामक हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्यों से मदद की गुहार लगाये थे। लेकिन यह पहला अवसर है जब चाह कर भी उनकी मदद नहीं कर पाया था। इसके कारण उन्होंने नाराज़ होकर मुझसे आग्रह किया था कि "प्रसेनजित जी! जब मेरी मदद नहीं कर सकते हैं तो इस ग्रुप से मुझे बाहर कर दीजिए।" लेकिन बहुत ही दुख की बात है कि इस ग्रुप के लोग उन्हें मदद करना तो दूर सांत्वना देना भी जरूरी नहीं समझे और दूसरे लोगों के अनावश्यक सन्देश भेज-भेज कर अपनी विद्वता का बखान करते रहे। अतः कौशिक बन्धुओं से आग्रह है कि कृप्या संकटग्रस्त लोगों की मजबूरियों को भी समझें। उनके दुःख में साथ दें। मैं चाहता था कि मेरे मरने के बाद कोई भी व्यक्ति यह न कहे कि प्रसेनजित ने बूरे समय में मेरा साथ नहीं दिया है। लेकिन लगता है कि काल को अब यही मंजूर है। विशेष क्या कहूँ? जिन्दा रहा तो फिर मिलेंगे।

किश्तियां बह जाती हैं जब तूफां चले आते हैं।
यादें रह जाती हैं जब इंसां चले जाते हैं।। ✍️



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।। भृगुवंशोद्भवं वन्दे कौशिकान्वयभूषणम् ।।
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