शुक्रवार, 29 मई 2026

Importance of Investigative Journalism

खोज़ी पत्रकारिता के महत्व और चुनौतियां 

यह रिपोर्ट इंवेेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट तथा प्राइवेट इंवेस्टिगेशन सर्विस का व्यवसाय करने वाले लोगों के साथ केस-मुकदमों से पीड़ित लोगों के लिए भी है। अतः इसे जरूर पढ़ें। हो सकता है कि यह आपके काम आये।



डॉ चन्द्रशेखर नामक इसी अधीक्षक के कहने पर इंजुरी रिपोर्ट बनाने से मना किया गया था NMCH के कर्मचारियों को 

केसीआईबी, पटना। 
एनएमसीएच के अधीक्षक डॉ (प्रोफेसर) चन्द्र शेखर के अधीन 528 बेड्स से सुसज्जित तमाम जरूरी सुविधाओं से सम्पन्न नालन्दा मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल! आकस्मिक चिकित्सा, जाँच और रिपोर्टिंग का दावा करता है। मगर आपराधिक हमलों के शिकार मरीजों की चिकित्सा और सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देता है। हालांकि इस बात की एनएमसीएच प्रशासन लिखित घोषणा नहीं करता है मगर यहाँ इलाजरत मरीजों के साथ आये दिन होने वाली घटनाओं और कर्मचारियों के द्वारा किये जाने वाले दुर्व्यवहार की शिकायतों के बाद खोज़ी पत्रकारिता की सेवा देने वाली मेरी कम्पनी Kaushik Consultancy Intelligence Bureau के द्वारा शुरू किए गए प्रारम्भिक जाँच के दौरान ही दिखे स्पष्ट संकेतों और पुख्ता सबूतों से साबित होता है। खाजेकलां थाना काण्ड संख्या 402 /2019 के अनुसार हरनाहा टोला, देवी स्थान के पास रहने वाले अखिलेश सिन्हा नामक एक ट्रैफ़िक पुलिस की सोलह वर्षिय नाबालिग बेटी स्थानीय अपराधी नीरज कुमार के द्वारा किये गये जानलेवा हमले में जख्मी होने के कारण दिनांक 18.09.2019 से ही पटना के NMCH में इलाजरत थी। अखिलेश सिन्हा की वह बेटी एक राज्य स्तरीय महिला तैराक होने के साथ एनसीसी और इप्टा की सदस्य भी है। प्रियंका श्रीवास्तव नामक उस बेटी को अस्पताल के कर्मचारियों और आसपास के मरीज़ों के भरोसे छोड़ कर अखिलेश सिन्हा दवा लाने के लिए गये हुए थेे, तब अकेलेपन का फायदा उठाते हुए वहाँ के कर्मचारियों ने प्रियंका श्रीवास्तव को डिस्चार्ज स्लीप थमा कर यह कहते हुए हॉस्पिटल से नाम काट दिया कि "तुम्हारा कोई पुलिस केस नहीं है, चलो भागो यहाँ से"। मात्र सोलह साल की नाबालिग बच्ची जिसे हाल में ही आठ-दस अपराधियों के द्वारा बूरी तरह मार-पीट कर जख्मी कर दिया गया था उसके ऊपर उस समय जो बीत रही होगी उसकी आप भी कल्पना कर सकते हैं। अपने घर-परिवार से दूर अनजान लोगों के बीच अस्पताल के कर्मचारियों की कटुक्तियों से सहमी हुई वह नाबालिग लड़की जिस तरह की मानसिक तनाव से जूझ रही होगी, आप उसेे महसूस भी कर रहे होंगे। अस्पताल के कर्मचारियों को डिस्चार्ज स्लिप देने के लिए उसके अभिभावक के आने तक इंतजार करना चाहिए था। मगर सुनियोजित साजिश के तहत उस काण्ड की शिकार बच्ची को डराने के लिए ही धरती के भगवान समझे जाने वाले डॉ प्रोफेसर चन्द्रशेखर के यूनिट में कार्यरत कर्मचारियों का दुरुपयोग किया गया था। एन.एम.सी.एच. के जिन कर्मचारियों के भरोसे अपनी बच्ची को छोड़कर अखिलेश सिन्हा दवा और रिपोर्ट आदि लाने के लिए गये हुए थे, उन्हीं लोगों ने दिनांक 21.09.2019 को जख्मी प्रियंका श्रीवास्तव को पूरे वदन में दर्द और सिर चकराने की शिकायत के बाद भी जबरन अस्पताल से बाहर कर दिया था। 


इस घटना की सूचना 21 तारीख को लगभग 03:00 बजे के करीब मिलते ही मैं अपनी टीम के साथ पीड़ितों के पास पहुंच गया था। जब मैंने पुलिस केस से सम्बन्धित डॉक्युमेंट्स देखने के लिए एन.एम.सी.एच. की गोपनीय शाखा के इंचार्ज पंकज मिश्रा से पूछताछ किया तो उन्होंने बताया कि "प्रियंका श्रीवास्तव के नाम से जख्म-प्रतिवेदन बनाने के लिए अभी तक न तो कोई आवेदन प्राप्त हुआ है और न ही स्थानीय थाना से ही किसी कर्मचारी ने इसके लिए सम्पर्क किया है। अतः आपका कोई पुलिस केस नहीं बनता है।" जबकि इस केस के आइ.ओ. ने अपना बचाव करते हुए इस आरोप को निराधार बताते हुए तत्परता पूर्वक सभी कानूनी कारवाई विधिवत् करने की बात कही है। इस मामले की छानबीन करने पर पता चला कि खाजेकलां थाना काण्ड संख्या 402/2019 के आई.ओ चन्द्र शेखर शर्मा ने शिकायतकर्ता की जख्मी बेटी प्रियंका श्रीवास्तव का इलाज कर के जख्म-प्रतिवेदन बनाने के लिए आवेदन गुरू गोविंद सिंह हॉस्पिटल के अधीक्षक को दिया था। लेकिन उस अस्पताल ने पीड़िता का जख्म प्रतिवेदन बनाने के बजाए जख्मी मरीज की नाक से हो रहे अधिक रक्त श्राव को देखते हुए सीटी स्कैन करवाने का निर्देश देकर मरीज को NMCH, Patna मे रेफर कर दिया था। NMCH के नाम से प्रसिद्ध पटना के इस राजकीय हॉस्पिटल में जाने पर भी मरीज को भर्ती करने के लिए उसके परिजनों को काफी मसक्कत करना पड़ा था। लगभग चार घण्टों के बाद बिहार सरकार के मंत्री नन्द किशोर यादव की पैरवी पर उसे भर्ती तो कर लिया गया, लेकिन ऊपरी कमाई के लिए अपनी जमीर बेचने वाले चिकित्सकों ने प्रियंका श्रीवास्तव के हमलावर नीरज कुमार के इशारे पर मामले को रफा-दफा करने के लिए चाल चलना शुरू कर दिया था। नियमतः अधीक्षक के द्वारा अपने यूनिट में जख्मी मरीज को भर्ती करते ही स्थानीय थाना प्रभारी को सूचित करना चाहिए था ताकि स्थानीय थाना में जख्मी मरीज का फर्द बयान दर्ज कर के जख्म-प्रतिवेदन बनाने की कारवाई की जाती। मगर अधीक्षक ने स्थानीय थाना को इसकी सूचना नहीं देकर मरीज की इंजूरी रिपोर्ट बनाने के काम में जान-बूझकर रोड़ा अटकाने का काम किया था। इस केस के आई.ओ. या थाना प्रभारी का भी घटना स्थल पर नहीं आना तथा अस्पताल में भर्ती मरीज से भी कोई बयान न लेना, ननबेलेबल एक्ट का मामला होते हुए भी जान-बूझकर हल्की धाराओं के तहत मामला दर्ज करना तथा हफ्तों बाद भी आरोपी को गिरफ्तार न किया जाना साबित करता है कि समस्त सरकारी महकमा आरोपी के प्रभाव में कार्य कर रहा था। इसके कारण भयभीत अखिलेश सिन्हा और उसके परिजन हमें बार-बार फ़ोन करके दोषियों को गिरफ़्तार करवाने का आग्रह कर रहे थे। 


प्रारम्भिक जाँच से वह मामला मुझे ज्यादा संगीन नहीं लग रहा था। लेकिन जब एक दिन पटना के ट्रेफिक पुलिस के रूप में कार्यरत सिपाही अखिलेश सिन्हा रात में 07:00 बजे अपनी पत्नी और बेटी के साथ अचानक हमारे घर पर पहुंच कर मदद की गुहार करने लगे, तब मामले की गम्भीरता पर यकीन हुआ। उन लोगों ने मुझे बताया कि "पुलिस किसी भी दोषी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया है। इसके कारण वे लोग बेखौफ हो गये हैं। पुलिस भी उनसे मिली हुई है। जिसका लाभ लेकर वे लोग मेरी बेटी और पत्नी को डराने के लिए मेरे दरवाजे के सामने रोज फायरिंग कर रहे हैं।" अपने घर से छः-सात किलोमीटर दूर स्थित मेरे आवासीय कार्यालय में वे लोग घनघोर वर्षा में भिंगते हुए आये थे। जिसके कारण मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि मामला गम्भीर रूप ले चुका है। काम का समय खत्म हो जाने के बाद भी अपने वकील को बुला कर रात में ही मामले के सम्बन्ध में आवश्यक पूछताछ किया। फिर अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए उस मामले को रफा-दफा करवाने के प्रयास में शामिल थाना से लेकर अस्पताल के कर्मचारियों, अधिकारियों सहित एक-एक आरोपितों के खिलाफ़ पर्याप्त साक्ष्य की व्यवस्था करने के लिए निर्धारित शर्तों पर कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। जिनके द्वारा मुझे वह कॉन्ट्रैक्ट मिला था उनकी भी सहमति मिलते ही रात्रि 09:00 बजे आरक्षी अधीक्षक, पटना के आवास पर जाकर सविस्तार घटना के बारे में सुचित किया और डरे-सहमे लोगों की शिकायत की वास्तविकता जानने के लिए रात्रि 10:30 बजे के करीब शिकायतकर्ताओं के साथ उनके घर पर जाकर आस-पास के माहौल का मुआएना किया था। उस क्रम में अगले दिन उस मामले से सम्बन्धित सभी भ्रान्तियों का निराकरण करने के लिए आरोपित और प्रत्यारोपित सभी लोगों से मिला। पीड़ितों ने मुझसे कहा था कि आरक्षी अधीक्षक को अपराधियों ने पचास हजार रुपया दिया है, इसके कारण पुलिस मेरी मदद नहीं कर रही। एसपी ही मेरा काम नहीं होने दे रहा है। इसके बावजूद मैंने उनकी सहायता करने की सहमति देते हुए छानबीन शुरू कर दिया। 


इस केस में मैने पहली बार ऐसे व्यक्ति को देखा जो मेरे सोकर उठने से पहले ही मेरे घर में आकर बैठ जाता। उसकी जिद के कारण मुझे जहाँ भी जाना होता उसे अपने साथ ले जाना पड़ता था। उस समय मैं खुद Winging of Scapula से पीड़ित होने के कारण घोर आर्थिक किल्लत से जूझ रहा था, इसके कारण वह केस अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। हालांकि अपने क्लाइंट के जिद्दी स्वभाव के कारण मैं स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पा रहा था। इसके बावजूद आरक्षी अधीक्षक पूर्वी पटना, वरीय आरक्षी अधीक्षक पटना, आरक्षी उपाधीक्षक पटना सिटी और एनएमसीएच के अधीक्षक सहित उस घटना से सम्बन्धित कर्मचारियों और आम लोगों से भी व्यक्तिगत रूप से मिलते हुए सम्बन्धित मामले की जानकारी जुटाता रहा। इस दौरान जब पीड़ित व्यक्ति साये की तरह पीछे पड़ा हो तब वाद-विवाद होना लाजिमी है। इसके बावजूद जब झगड़ा-झंझट और खतरे मोल लेकर पर्याप्त साक्ष्यों की व्यवस्था होते ही मैंने शर्त के अनुसार अपराधियों की गिरफ्तारी के पहले अपने कॉन्ट्रैक्ट के आधे पैसे की माँग किया, तब अपराधियों का नाम सुनते ही थर-थर काँपने वाला ट्रैफिक पुलिस अखिलेश सिन्हा ने मुझ पर आरोप लगाते हुए कहा कि "आपको अपने दुश्मनों के यहाँ भी जाते हुए हम देखे हैं। इसलिए मुझे आप पर भरोसा नहीं है। पहले इन लोगों को गिरफ्तार करवाइए, उसके बाद सारा पैसा एक ही बार में ले लीजियेगा। इसके पहले मैं एक भी पैसा नहीं दुँगा।" काफी समझाने पर भी जब वह नहीं माना तो उसकी मंशा समझ कर मुझे बैरङ्ग लौटना पड़ा था। लेकिन घर लौटने के बाद मुझे इस बात की जानकारी हुई कि अखिलेश सिन्हा ने बहस के दौरान ही जिस समय मैं अपना बैग सिटी कोर्ट में स्थित अपने चाचा जी के चैम्बर में ही छोड़ कर कुछ देर के लिए बाहर निकला था, उसी दौरान अखिलेश सिन्हा ने मेरे पास मौजूद अपने साक्ष्यों वाला फाइल गायब कर दिया था। जो यकीनन चोरी की ही घटना थी। लेकिन पटना के मुसल्लहपुर नामक बस्ती में महारानी गैस एजेंसी चलाने वाले जिस व्यक्ति के द्वारा उस सिपाही से मेरी परिचय हुई थी, उसके द्वारा मेरा पैसा दिलवाने की गारंटी दिये जाने के कारण मैं चुप रहा। लेकिन उस धोखाधड़ी के बाद मैंने वह केस छोड़ दिया था। इसके बावजूद मुझे काफ़ी दिनों तक उस मामले को मैनेज़ करने के लिए अस्पताल के कर्मचारियों और पुलिस कर्मियों के कॉल आते रहे थे। मैं चाहता तो अखिलेश सिन्हा से ज्यादा रकम आरोपित युवक नीरज कुमार से ले कर अपनी जरूरतों को पूरा कर सकता था। लेकिन मेरे लिए सिद्धांतों से बढ़कर कुछ भी नहीं है। 


मुझे बाद में पता चला कि कुछ अपराधियों को उस मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन अब उस मामले से मुझे कोई लेना देना नहीं था। फिर भी छानबीन करने के दौरान हुए खर्च की वसूली के लिए जैसे ही अखिलेश सिन्हा से दूबारा सम्पर्क किया उसने कुछ नशेरियों से फोन करवा कर मुझे भी रंगदारी माँगने के आरोप में फँसाने की धमकी देने लगा। बस इतना होते ही मैं अखिलेश सिन्हा नामक सिपाही को अच्छी तरह से समझ गया और भूल चुके मामले की नये सिरे से छानबीन करने के लिए पुनः जुट गया था। तब जाकर यह स्पष्ट हुआ कि अपनी बेटी की इज्ज़त लूटने की कोशिश करने का विरोध करने पर जानलेवा हमला करने का आरोप अखिलेश सिन्हा ने अपनी बेटी से जबरन लगवाया था। दरअसल वह मामला जमीनी विवाद का मामला था। जिसके कारण हुए छिटपुट झड़प के दौरान बीच-बचाव कर रही अखिलेश सिन्हा की बेटी प्रियंका श्रीवास्तव अपने घर के सामने स्थित फिसलन वाली सड़क पर खुद ही गिर गई थी और ईट के ढेर पर मुँह के बल गिरने के कारण उसकी नाक की हड्डी टूट गई थी। फिर क्या था सच्चाई सामने आते ही मैं समझ गया कि खुद को पीड़ित दिखाने वाला ट्रैफिक पुलिस अखिलेश सिन्हा हर समय मेरे पीछे क्यों पड़ा रहता था। 


इस मामले की छानबीन करने के दौरान मुझसे जिस तरह की चूक हो गयी थी, इसी तरह अनुसन्धान के कार्य में लगे पुलिसकर्मियों से भी गलती हो जाती है। हालांकि पुलिसकर्मियों द्वारा तैयार किया गया अधिकांश जाँच रिपोर्ट झूठा, मनगढ़ंत और रिश्वत ले-देकर बनवाया हुआ होता है। इसके कारण समय-समय पर पुलिस कर्मियों के विरुद्ध आवाजें भी उठती रही हैं। इसके कारण केस-मुकदमों से पीड़ित लोगों सहित केस दर्ज करवाने वाले लोगों को भी प्राइवेट इंवेस्टिगेशन सर्विस देने वाले कम्पनियों व खोज़ी पत्रकारों की सेवा जरूर लेनी चाहिए। लेकिन इस तरह का काम करने वाले लोगों को भी मेरी नसीहत है कि इस तरह के काम भावुक होकर न करें। न ही किसी के दबाव में काम करें। बल्कि पूरी तरह से एक पेशेवर की तरह दी जाने वाली सेवाओं की सूची, उसके लिए निर्धारित सेवा शुल्क व आवश्यक शर्तों का उल्लेख करते हुए अपनी कम्पनी का काँट्रैक्ट एग्रीमेंट/बॉण्ड प्रपत्र बना लें। जब भी कोई केस हाथ में लें तब उस प्रपत्र पर विधिवत रूप से एग्रीमेंट जरूर करवायें। इस तरह का बन्ध-पत्र इसलिए भी जरूरी है ताकि दोनों पक्षों का एक-दूसरे के प्रति विश्वास बना रहे। मैं इसलिए ऐसी नसीहत दे रहा हूँ क्योंकि ऐसे कई मामलों में मैंने अपने हजारों रुपये खर्च कर के लोगों के काम तो करवा दिया लेकिन अन्त में पेमेंट के लिए नोक-झोंक और अधिकांश मामलों में धोखा ही पाया हूँ। 


अतः प्राइवेट इंवेस्टिगेशन का काम करने वाले लोगों को मेरी नसीहत है कि आप जरूरत से ज्यादा समाजसेवी न बने, बल्कि एक प्रोफेशनल की तरह काम करें। क्योंकि आपके पास पैसा होगा तभी अपने घर में भी इज्ज़त होगी। प्राइवेट इंवेस्टिगेटर की सेवा लेने वाले लोगों से भी आग्रह है कि इस तरह की धोखाधड़ी नहीं करें। क्योंकि खाजेकलां थाना काण्ड संख्या 402/2019 के जिस केस को मैनें रास्ते पर लाकर छोड़ दिया था उसके आरोपी पुलिस अखिलेश सिन्हा की जीती हुई बाजी को मैने न सिर्फ़ पलट दिया था बल्कि अपनी गिरफ्तारी के डर से फरार चल रहे मुख्य आरोपी को गिरफ्तार होने से बचा भी दिया था। अतः कभी भी अपने मददगार से धोखाधड़ी न करें। 


इस मामले में आरोपित लोग भले ही बेगुनाह थे लेकिन इलाज़रत युवती का जख्म प्रतिवेदन नहीं बना कर एनएमसीएच के डॉक्टरों ने अपराध तो कर ही चुका था। उन लोगों ने इस मामले में आरोपित नीरज कुमार से मिले हुए रिश्वत के लोभ में ऐसा किया था, जो पूरी तरह से गैरकानूनी और दण्डनीय अपराध है। फिर भी NMCH के जो अधीक्षक और खाजेकलां थाना के पुलिस अधिकारी मेरा नाम सुनते ही अपने चैम्बर से गायब हो जाते थे उन लोगों से भी जब दुबारा मुलाकात हुई तब उस केस के मामले में परेशान करने के लिए माफ़ी माँगते हुए सच्चाई बता दिया था, ताकि हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध सभी तरह के लोगों से बना रहे। हालांकि उस मामले में फँस रहे लोगों ने मुझे भी रिश्वत की रकम में हिस्सेदारी देने की पेशकश की थी। लेकिन अपने उसूलों के कारण उनकी चाय तक पीने से इंकार कर दिया था। लेकिन लगता है कि इस देश में ईमानदारी से काम करने वाले लोगों को हर जगह धोखा ही मिलता है। इसके बावजूद धोखेबाज़ लोगों के लिए जब सारे दरवाजे बन्द हो जाते हैं तब भी ऐसे धोखेबाज़ लोग हमारे जैसे लोगों के पास ही आते हैं। क्योंकि ऐसे लोग भली-भांति जानते हैं कि इमानदारी से काम करने वाले लोग दयालु होते हैं और धोखा देने वाले लोगों से भी मीठे बोल सुनते ही पुरानी बातें भूल जाते हैं। 


ऐसे लोगों के द्वारा मुझे इस्तेमाल करने के लिए अभी भी ढूंढा जा रहा है। मैं भी अपनी आदतों से लाचार हूँ। मुझसे ही धोखेबाज़ी करने वाले लोग भी जब मेरे शरण में आ जाते हैं तो उन्हें अपने क्षात्रोचित संस्कारों के कारण मदद करने से इंकार नहीं कर पाता हूँ। जबकि मैं जानता हूँ कि अजमेर के राजा पृथ्वी राज चौहान की गिरफ्तारी भी शरण में आये हुए दुश्मनों को माफ़ करने के कारण ही हुआ था। फिर भी आशा करता हूँ कि मदद माँगने वाला हर आदमी धोखेबाज़ नहीं होता है। क्योंकि ऐसे लोगों को भी मैंने देखा है जो चाहे लाख मुसीबत में क्यों न हों लोगों के सामने हाथ नहीं फैलाते हैं। ऐसे लोगों में अपने ही लोगों के द्वारा धोखा खाते-खाते टूट चुके लोग भी होते हैं। अतः आपके साथ भी यदि गलत हो रहा है और उसके कारण आपकी नींद तक उड़ चुकी है। अपने झंझावातों से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है तो हमसे निःसंकोच होकर मिलें। हो सकता है की यहाँ पर आपकी समस्या का समाधान हो जाए। लेकिन ध्यान रहे अब मैंने बिना एग्रीमेंट करवाये किसी भी केस में हाथ लगाना छोड़ दिया है। एग्रीमेंट होने से दोनों पक्षों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास बना रहता है। 💞



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हिन्दी की दुर्दशा के कारण और समाधान


कब तक होता रहेगा हिन्दीभाषी लेखकों, अनुवादकों और प्रूफ़रीडर्स से बन्धुआगिरी? 

किस्सा Hindi और English के मिश्रित भाषा "Hinglish" के शुरुआत की


सरकारी उदासीनता के कारण हिन्दी लेखकों को दिहाड़ी करने वाले अशिक्षित मजदूरों से भी कम दिया जाता है पारिश्रमिक

सृजनात्मक लेखन के कार्य आसान नहीं हैैं मगर लेखकों के सहज और स्वभाविक उत्पाद होने के कारण उन्हें इसके लिए उतना मशक्कत नहीं करना पड़ता है जितना उसे प्रकाशित करने योग्य बनाने वाले प्रूफ़रीडर्स और अनुवादकों को। दूसरे लेखकों की भावना को समझते हुए उसी तरह के भाव प्रकट करने वाले एक-एक शब्द का दूसरे भाषा में अनुवाद करना कठिन कार्य है। इसके लिए वाकई में हिन्दी भाषा के प्रूफ़रीडर्स और अनुवादकों को जो पारिश्रमिक मिल रहा है वह अपर्याप्त तो है ही हम हिन्दीभाषियों के लिए शर्मनाक भी है। 

मैं अनुवादक (ट्राँसलेटर) तो नहीं हूँ, मगर हिन्दी भाषा का लेखक और प्रूफ़रीडर जरूर हूँ। ट्राँसलेटर की तरह ही प्रूफ़रीडिंग का काम भी कठिन मानसिक परिश्रम करने वाला है। कभी-कभी तो यह इतना ऊबाऊ हो जाता है कि अनावश्यक शब्दों और वाक्यांशों को हटाने के कारण अपनी बेइज्जती समझने वाले लेखकों और सम्पादकों के दबाव के कारण अनावश्यक शब्दों और वाक्यांशों को कहां से उठाकर कहां सेट करना है इसका निर्णय करना प्रूफ़रीडिंग के कार्य करने वाले लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। इसके कारण जिस तरह के श्रम प्रूफ़रीडिंग करने वाले लोगों को करना पड़ता है उसके लायक पारिश्रमिक नहीं मिलने से अधिकांश लोग अपने कार्य में जानबूझ कर लापरवाही बरतने लगते हैं। ऐसा हिन्दी भाषा की अच्छी समझ नहीं रखने वाले उन हिन्दीभाषियों की जिद के कारण हो रहा है जो अन्य विषयों की बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर खुद को हिन्दी भाषा के भी विद्वान समझने लगते हैं। ऐसे ही विद्वानों की सूची में हैं बिहार के पटना जिला में स्थित Good Man Publications के मालिक प्रोफेसर आर. के. सिन्हा। 

प्रोफेसर आर. के. सिन्हा बिहार यूनिवर्सिटी में इंग्लिश से एम.ए. करने के बाद मेरे गाँव के बगल में स्थित ज्योति कुंवर महाविद्यालय नामक ऐसे कॉलेज में प्रोफेसर बन गये जो साल में सिर्फ़ दस दिन ही खुलते हैं। बाकि समय में बेतहाशा कमाई करने के लिए इन्होंने स्वलिखित इंग्लिश ग्रामर एण्ड ट्रान्सलेशन के किताबों की मार्केटिंग करने के लिए अपना प्रेस भी खोल लिया था। यहाँ तक तो ठीक है लेकिन इन्होंने हद तब पार कर दिया जब हिन्दी-इंग्लिश दोनों भाषाओं में लिखे गये अपने पुस्तकों में हिन्दी व्याकरण के सम्बन्ध में गलत जानकारी देने लगे। इन्होंने अपने पुस्तकों के द्वारा हिन्दी व्याकरण की बखिया उधेड़ने का काम 1996 ईस्वी में प्रकाशित अपनी पुस्तक "Oxford Junior English TranslationOxford Junior English GrammarOxford Basic English Translation और Oxford Basic English Grammar" से ही कर दिया था। 

संयोगवश मुझे उनके प्रेस में प्रूफ़रीडर के रूप में काम करने का अवसर मिला। लेकिन मेरी नज़र जैसे ही बिहार में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली व्याकरण की उस पुस्तक में भरे हुए हिन्दी व्याकरण से सम्बन्धित अशुद्धियों और गलत जानकारी पर पड़ा, मैंने ईमानदारी पूर्वक प्रूफ़रीडिंग कर के कम्पोजर से मूल प्रति दिखाने का आग्रह किया था। लेकिन उसका जवाब सुनकर मुझे तब आश्चर्य हुआ जब उसने मुझे यह नसीहत देते हुए कहा कि मैं आपकी बातों से सहमत हूँ, लेकिन आपको अपनी नौकरी बचानी है तो प्रोफेसर साहब के लिखे हुए वाक्यांशों में काट-छांट या फेरबदल न करें। इससे उनके स्क्रिप्ट के अलावा कोई अन्य अशुद्धि दिखे तो सिर्फ़ उसे ही मार्क करें। कम्पोजर के समझाने के बाद भी मैने दिल की बात Good Man (P & T) के प्रोपराइटर और उसके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के लेखक प्रो. आर. के. सिन्हा से कह दिया था। लेकिन उनका जवाब सुनते ही मैं समझ गया था कि अपने भावों और विचारों को हिन्दी भाषा में शुद्ध-शुद्ध लिखने, पढ़ने और बोलने की शिक्षा देने वाले शास्त्र के खिलाफ़ आधुनिक शिक्षा के नाम पर जो दुष्प्रचार और साजिश चल रहा है उसके खिलाफ़ हिन्दीभाषी लेखकों और समाजसेवियों को जगाना होगा। फिर क्या था मैंने वहां से इस्तीफा दिया और हिन्दी लेखकों भुवनेश्वर गुरमैता और नामवर सिंह को चिट्ठी लिख दिया। लेकिन परिणाम वही हुआ - "ढाक के तीन पात"। 

हिन्दीभाषी लेखकों और पत्रकारों के द्वारा हिन्दी के वाक्य के अन्त में पूर्ण विराम के चिन्ह "।" की जगह इंग्लिश में इस्तेमाल होने वाले फूल स्टॉप के चिन्ह "." का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाने लगा। जो प्रो. आर. के. सिन्हा के द्वारा एक प्रयोग के तौर पर 1996 ईस्वी में शुरू किये गये Hindi और English के मिश्रित भाषा "Hinglish" की शुरुआत थी। 

आर. के. सिन्हा जैसे लोगों के पदचिन्हों पर चलने वाले हिन्दीभाषी लोगों के कारण ही आज हिन्दी भाषा के लेखकों और साहित्यकारों को वह सम्मान नहीं मिल रहा है जो हिन्दीभाषी लोगों के देश में इंग्लिश बोलने वाले लोगों को मिलता है। ऐसा सिर्फ इसी देश में है, जहाँ की राष्ट्रभाषा का दर्जा हिन्दी को मिलने के बाद भी खुद सरकारी एजेंसियां ही इंग्लिश में काम करने में गर्व महसुस करती है। ऐसे लोगों के कारण ही क्रियेटिव राइटिंग, प्रूफ़रीडिंग और ट्रांसलेशन के कार्य करने वाले हिन्दीभाषी लोगों को अन्य भाषा में कार्य करने वाले लोगों की अपेक्षा कम पारिश्रमिक दिया जाता है। 

हिन्दी भाषा के प्रूफ़रीडर और ट्रांसलेटर को कम से कम 50 पैसे/शब्द पारिश्रमिक देना चाहिए। यानी प्रति 1000 शब्दों के लिए न्यूनतम 500/- रुपये पारिश्रमिक तो देना ही चाहिए। यही शुल्क हिन्दीभाषी अनुवादकों को भी दिया जाना चाहिए। लेकिन मिलता है 300/- रुपये भी नहीं। इसके लिए देश और दुनियां की जानकारी के लिए बनने वाले देशी-विदेशी वेबसाइटों में मनपसन्द भाषा का चयन करने के लिए दिये जाने वाले आप्शन के रूप में हिन्दी भाषा को सेलेक्ट करने का विकल्प बहुत ही कम दिखाई देता है। इसके लिए भारत सरकार के सूचना, प्रसारण और संचार मंत्रालय को भी पहल करना चाहिये। लेकिन देश भर में हिन्दी दिवस मनाने के नाम पर खानापूर्ति करने के अलावा यह मंत्रालय हिन्दी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने या प्रचार-प्रसार के लिए जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं कर रहा है। 

मेरे ख्याल से हिन्दी भाषा के विकास के लिए सरकारी उदासिनता के कारण ही हिन्दी भाषी लेखकों और अनुवादकों के समक्ष भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई है। विदेशी भाषा सीखने और सिखाने के लिए दुनियां की सभी भाषाओं का सहारा लिया जाता है, लेकिन हिन्दीभाषी लोग विदेशी भाषा की शिक्षा हिन्दी भाषा में नहीं ले सकते हैं। इसका कारण है विदेशी भाषाओं को सिखाने वाले पुस्तकों के हिन्दी भाषा में अनुवाद, लेखन और प्रकाशन के कार्य के लिये विदेशी भाषा जानने वाले हिन्दीभाषी लेखकों और सरकार की उपेक्षा। 

वाकई में, हिन्दीभाषी लेखकों और अनुवादकों के प्रति सरकारी उपेक्षा के कारण ही हिन्दी भाषा के अच्छे विद्वान होने के बावजूद इंग्लिश या अन्य विदेशी भाषा नहीं जानने वाले लेखकों के समक्ष भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई है। यदि सरकार इस भाषा के विकास के लिए योजनाएं बना कर सही तरीके से लागू करवाये तो इस देश में बेरोजगारी की समस्या घट कर आधी हो जाएगी। इसके लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा किया था कि "अब हिन्दी भाषा में भी मेडिकल कोर्स कर सकेंगे हिन्दीभाषी लोग"। 

हिन्दी भाषा के विकास के लिए मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा किये गये घोषणा को कार्यान्वित करने के लिए मध्य प्रदेश की सरकार ने पहल शुरू किया या नहीं, इसके बारे में मुझे प्रमाणिक जानकारी नहीं है। लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी सभ्यता और संस्कृति का विकास हमारी मूल भाषा में ही अध्ययन-अध्यापन के द्वारा सम्भव है। यही कारण है कि इस देश के अलावा दुनियां के लगभग सभी विकसित देशों में वहाँ की मूल भाषा में ही पढ़ने-पढ़ाने का नियम है और इसे सख्ती के साथ लागू भी करवाया जाता है। लेकिन भारत सरकार के द्वारा अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति उदासीनता के कारण ही इस देश की बहुसंख्यक आबादी अपने ऊपर जबरन थोपे जाने वाले अंग्रेजी भाषा की समझ नहीं होने के कारण अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और उसका खामियाज़ा जिन्दगी भर भुगतने के लिए मजबूर होते हैं।

जिस तरह से फ्रांस में पढ़ने के लिये अच्छी इंग्लिश जानने वाले लोगों को भी वहाँ की फ्रेंच भाषा सीखना पड़ता है, रूस में पढ़ने के लिए इच्छुक लोगों को वहाँ की रसीयन भाषा सीखना पड़ता है, चाइना में पढ़ने के लिये इच्छुक लोगों को वहाँ की स्थानीय भाषा मन्दारी सीखना पड़ता है, उसी तरह से भारत में पढ़ने वाले छात्रों को भी अपनी राष्ट्र भाषा हिन्दी में ही अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था करवाने के लिये हिन्दीभाषी लेखकों को प्रोत्साहित करना चाहिये। कम से कम इसका प्रयास तो करना ही चाहिए। यदि ऐसा हो गया तो यकीनन इस देश की दुर्दशा जरूर खत्म होगी। लेकिन महाराष्ट्र और दक्षिण भारतीय राज्यों में रहने वाले कुछ तथाकथित लोगों के द्वारा हिन्दीभाषी लोगों के विरोध को देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकारें हिन्दीभाषी राज्यों में भी हिन्दी भाषा के विकास के मुद्दे पर मौन धारण कर रखा है। हिन्दी और हिन्दीभाषियों के विकास के लिए वहाँ की सरकारें भविष्य में भी कुछ करेगी ऐसा दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि हिन्दीभाषी लेखक और भाषाविद् आज 15 पैसे और 20 पैसे प्रति शब्द में भी कार्य करने के लिए मजबूर हो हैं। सच्चाई यही है इस देश के हिन्दीभाषी लेखकों की। इनकी पारिश्रमिक दिहाड़ी मजदूरी करने वाले अशिक्षित लोगों से भी कम है। इसके कारण हिन्दी भाषा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। 

आज हिन्दी भाषा को अवैज्ञानिक और पिछड़े हुए लोगों की भाषा समझने वाले लोगों के कारण ही हिन्दीभाषी पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और पुस्तकों को पढ़ने वाले लोगों की संख्या लगातार घटती जा रही है। नालन्दा ओपेन यूनिवर्सिटी की सिलेबस से सम्बन्धित हिन्दीभाषी पुस्तकों की घटिया भाषा शैली के कारण ही मैंने उसकी सभी पुस्तकों को कुलपति के समक्ष फाड़कर फेंकने के बाद उस संस्थान में नामांकित होने के बावजूद मैने वह कोर्स सिर्फ़ इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि पूरी शुल्क लेने के बाद भी उस यूनिवर्सिटी के पटना में स्थित शाखा के द्वारा मुझे इतना घटिया पाठ्य सामग्री दिया गया था जिसे देखते ही उस यूनिवर्सिटी के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के स्तर को मैं समझ गया था। शिक्षा के नाम पर सिर्फ़ कागज के सर्टिफिकेट बेचने की दुकान मात्र बन कर रह गई है नालन्दा ओपन यूनिवर्सिटी जैसी संस्थायें। 

ट्राँसलेटर तो किसी रचना को अनुवादित कर के प्रकाशक को सौंप देता है, लेकिन उसकी दो-तीन चरणों में कम्पोजिंग और प्रूफ़रीडिंग के कार्य करने के बाद ही कोई पुस्तक या पत्र-पत्रिका प्रकाशित कर के पाठकों तक पहुंचाया जाता है। अनुवादक चाहे लाख अच्छा हो, जो पत्र-पत्रिका और पुस्तक बिना प्रूफ़रीडिंग करवाये प्रकाशित की जाती है, वह सुन्दर से सुन्दर ग्राफिक डिजाइनिंग और पैकिंग के बाद भी पाठकों का विश्वास नहीं जीत पाता है। पाठक का दिमाग कोरा काग़ज़ की तरह बिल्कुल खाली हो तो अधकचरे ज्ञान का सर्टिफिकेट पाकर भी खुद को ज्ञानी समझने लगता है। आजकल ऐसे ही ज्ञानियों का चलन है। क्योंकि उन्हें सही शिक्षा मिली ही नहीं है। अतः हिन्दीभाषी लेखकों, अनुवादकों और प्रूफ़रीडिंग के कार्य करने वाले लोगों को भी अच्छी पारिश्रमिक देने का प्रयास करना चाहिए। तभी लोगों को सही, शुद्ध और विश्वसनीय ज्ञान भण्डार वाले पुस्तक प्राप्त होंगे।


सोमवार, 25 मई 2026

Winging of Scapula एक असाध्य रोग

अंग विच्छेदन और पुनर्वास पर अध्ययन करने के लिए बनाये गये अन्तर्राष्ट्रीय वेबसाइट पर जब मैंने देखा अपनी तस्वीर 

✍️ प्रसेनजित सिंह

मैं Wringing of Scapula नामक जिस लाइलाज़ बीमारी से पिछले चार वर्षों से जूझ रहा हूँ उस पर अभी रीसर्च चल रहा है। दुनियाँ भर के फिजियोथेरापिस्ट इसका इलाज ढुंढने के लिए प्रयत्नशील हैं। डॉक्टरों के जिस भारतीय टीम के लोग इसके लिए ज्यादा सक्रिय हैं उन लोगों में से पटना के NMCH में कार्यरत DR. Vishvanath ने मेरी कुछ तस्वीरें खींची थी। जिसे इंटरनेशनल हेल्थ रिसर्च आर्गनाइजेशन - Comite International, Geneve (ICRC) के समाचार पत्र Physiopedia पर पब्लिस्ड किया गया था। इस समुह की वेबसाइट www.physiopedia.com अंग विच्छेदन और पुनर्वास पर अध्ययन करने के लिए फिजियोपिडिया द्वारा विकसित और वितरित किया जाने वाला वह ऑनलाइन माध्यम है जिस पर दुनिया भर के फिजियोथेरापिस्ट अपने अनुभवों को साझा कर सकते हैं। ताकि न सिर्फ़ एक अध्ययन सामग्री के रूप में इस पत्रिका का विकास हो बल्कि फिजियोलॉजी से सम्बन्धित नये समाचारों से भी दुनियाँ भर के फिजियोथेरापिस्ट को अवगत कराया जा सके। 
इस साइट पर दुनियाभर के किसी भी देश के फिजियोथेरापिस्ट फिजियोपिडिया के लिए साझा करने लायक सामग्रियों यथा कंटेंट्स, वीडियो क्लिप्स और फोटोग्राफ्स को अपलोड और सम्पादित कर सकते हैं।

Comite International, Geneve - ICRC की इस वेबसाइट पर Winging of scapula नामक मेरी लाइलाज़ बीमारी के लिए NMCH, Patna के डॉक्टरों की जिस टीम ने मेरी दायीं ओर के प्रभावित अंग की तस्वीरें ली थी उन तस्वीरों में से एक तस्वीर इस वेबसाइट पर भी अपलोड किया गया है। 
जिसे संलग्न लिंक पर क्लिक कर के आप भी देख सकते हैं। वह लिंक है :👇

यह लिंक मुझे इसलिए देना पड़ा हूँ ताकि मेरी बीमारी को बहाना कहने वाले लोगों को मेरी बातों पर यकीन हो सके। इसी लिंक के द्वारा फिजियोपेडिया नामक वेबसाइट पर जाकर आप भी देख सकते हैं मेरी संलग्न तस्वीर और विंगिंग आफ स्कैपुला (Winging of Scapula) नामक मेरी असाध्य बीमारी के बारे में विस्तृत जानकारी।

physiopedia.com पर मेरी लाइलाज़ बीमारी Winging of scapula के बारे में बताते हुए डॉक्टर का स्क्रीनशॉट

जिस दिन मुझे डॉक्टरों ने कहा था - "Sorry! इसका कोई इलाज़ नहीं है। यह ऐसा बीमारी है जो धीरे-धीरे बढ़ता ही जाएगा। एकमात्र ईश्वरीय चमत्कार से ही यह ठीक हो सकता है। चाहे आप दुनियाँ के किसी भी हिस्से में चले जाइए, इसका कोई इलाज नहीं है। अतः मैं तो यही कहुंगा कि भारी चीज नहीं उठायें। नियमित रूप से फिजियोथेरैपी करवायें। लेकिन फिर भी संतुष्टि के लिए आपको जो-जो जाँच लिख रहा हूँ उसे करवा कर मुझसे मिलें।" 
उस दिन डॉक्टर ने मुझे क्या-क्या बताया सब भूल गया, सिवाय उस बात के कि "अब इसका कोई इलाज नहीं है।" डॉक्टरों के उस बात को सुनते ही मैं घोर हताशा में डूब गया था। लगा कि समाज पर बोझ बन कर जीने से अच्छा है कि अपनी जिन्दगी ही खत्म कर लूं। मगर सहसा जैसे ही इस बात का ख्याल आया कि मेरे मरने से मेरी बर्बादी चाहने वाले लोगों को तो इससे खुशी होगी ही, मुझे ईश्वर ने जिस काम को पूरा करने के लिए यह जीवन दिया है उसे छोड़कर जाने के बाद ईश्वर को भी क्या मुँह दिखाऊंगा? बस इसी बात का ख्याल आते ही मैंने ठान लिया था कि चाहे जितने दिनों तक मैं जी सकूं, उतने दिनों के अन्दर अपने समाज के लोगों को जगाने का काम करुंगा। शोषित और वञ्चित लोगों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए आखिरी साँस तक संघर्ष करुँगा। जो अपनी पहचान तक भूल चुके हैं उन्हें उनकी असली पहचान बता कर के सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करूँगा। इसके लिए प्रयास करने के बजाए लोगों को "मैं बीमार हूँ, लाचार हूँ" कहने से कोई मेरी मदद तो नहीं करेगा उल्टे मेरी मजबूरी को कामचोरी करने के लिए बहाना बता कर मेरी निन्दा ही करेंगे। और यही मेरे साथ हो भी रहा है। ऐसी ही परिस्थिति में मेरे जैसे लोग टूट कर आत्महत्या कर लेते हैं। 

आखिर कौन सी बीमारी हुई है मुझे जिसके बारे में सुनते ही मैं विचलित हो गया था और अस्पताल में ही फुट-फुट कर रोने के लिए मेरा कलेजा मचल उठा था? मगर लोग मुझे रोते हुए देख कर क्या समझेंगे, कौन मुझे ढांढ़स बँधाने आएगा? बस यही सोच कर लोक-लाज़ के कारण खुद को सम्भाला और भारी मन से उसी घर की ओर चल दिया जो मेरा कभी भी नहीं हो सका। हर पल मेरी बर्बादी की कामना करने वाली अपनी माँ और उसके ईशारा मात्र से मुझ पर दुश्मनों की तरह टूट पड़ने वाले परिजनों की चिन्ता छोड़ मुझे जीवन देने वाले भगवान से ही इसका कारण पूछने का निर्णय ले कर खुद को सम्भाल पाया था। 

आखिर किस बीमारी के कारण NMCH, PMCH और IGIMS के डॉक्टर्स मेरी बीमारी को लाइलाज़ कह रहे हैं? उस बिमारी के बारे में जानने के लिए मैं कई दिनों से गूगल पर सर्च कर रहा था। आखिर एक दिन अचानक गूगल की एक साइट पर मुझे मेरी ही वह तस्वीर दिखाई दी जिसे मेरी जाँच करते समय NMCH के डॉक्टर विश्वनाथ और डॉक्टर एस.के. सिन्हा की यूनीट ने खींचा था। इस सम्बन्ध में जब अपने डॉक्टर से पूछताछ किया तब पता चला कि ऐसे मामले बहुत कम आते हैं। इसलिए आपकी फोटो रिसर्च के लिए खींच कर रख लिया था। 

जाँच के दौरान जब डॉक्टरों ने एक किलो का वजनी सामान उठाने में भी बहुत ज्यादा ताकत लगाने की मेरी शिकायत की पुष्टि करने के लिए अपने प्रयोग के दौरान दाहिने हाथ पर जरा सा भी बल पड़ते ही मुझे दर्द से तिलमिलाते हुए देख चुका था। दाहिने हाथ से किसी भारी वस्तु को उठाने या खींचने से कन्धा को उखड़ने जैसा महसूस होने की शिकायत की पुष्टि दाहिने हाथ को बायें कन्धे की ओर करवा कर ही कर लिया था, तब डॉक्टरों ने मुझे दाहिने हाथ को हिलाने-डुलाने से भी मना करते हुए यह कहा था कि "यह बिमारी 3 लाख लोगों में से मात्र एक व्यक्ति को होता है। यह क्यों होता है इसके बारे में अभी तक कोई नहीं जान सका है। इसका कारण और इलाज़ पता करने के लिए पूरे विश्व में शोध हो रहा है। अतः मैं तो यही कहुंगा कि सतर्क रहिये। इस हाथ से एक किलो का भी सामान मत उठाइये और जहाँ तक हो सके भगवान से प्रार्थना कीजिए। क्योंकि कभी चोट लगने से आपकी नस दब गयी है और समय के साथ-साथ आपके शरीर के सभी अंग सूख जाएंगे।"

इस बात की जानकारी मेरे घर वालों को होते ही पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गयी और मेरी पत्नी जिसने अपने प्रेमी के साथ खुद को पकड़े जाने पर होने वाली बदनामी से बचने के लिए मुझे ही दहेज़ प्रताड़ना के झूठे केस-मुकदमों में फँसा कर जेल भेज दिया था, उसने कटाक्ष किया, "अभी क्या हुआ है, अभी तो तुममें कीड़े पड़ना बाकी है। देखते हैं कौन तुम्हारी मदद करता है।" 
चुकि मेरी पत्नी के परिजनों ने ही अगमकुआं थाना प्रभारी प्रमोद कुमार झा की शह पर मेरे साथ मार-पीट कर के मेरी वह हाल कर दी थी, इसके बावजूद मैं ही दहेज़ प्रताड़ना का आरोपी बनकर ग्यारह वर्षों तक कोर्ट का चक्कर काटने के लिए मजबूर हुआ था। उस बीमारी के कारण मेरी रोजी-रोटी तो छिन ही गई थी, दहेज़ प्रताड़ना के आरोप में जेल जाने से समाज में बनी-बनाई इज्ज़त भी चली गई थी। कहीं कोई अपना नहीं दिख रहा था। विकलांगों जैसी स्थिति होने पर भी हर ओर अपने प्रति लोगों के मुँह से कटाक्ष और गालियाँ सुनने का मैं आदी हो गया था। 

ऐसे में अपनी दवा और भोजन-पानी के लिए रुपयों की जुगाड़ करने के लिए चिकित्सकों के द्वारा पूर्ण विश्राम का निर्देश के बावजूद मुझे पेन किलर खा-खाकर अपनी बाइक स्वयं चलाते हुए काम करना पड़ रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरे कन्धों और बांह के नस पर्याप्त ताकत नहीं होने के कारण मेरी मोटरसाइकिल बार-बार दुर्घटनाग्रस्त हो जाती थी।........... क्रमशः