अंग विच्छेदन और पुनर्वास पर अध्ययन करने के लिए बनाये गये अन्तर्राष्ट्रीय वेबसाइट पर जब मैंने देखा अपनी तस्वीर
✍️ प्रसेनजित सिंह
मैं Wringing of Scapula नामक जिस लाइलाज़ बीमारी से पिछले चार वर्षों से जूझ रहा हूँ उस पर अभी रीसर्च चल रहा है। दुनियाँ भर के फिजियोथेरापिस्ट इसका इलाज ढुंढने के लिए प्रयत्नशील हैं। डॉक्टरों के जिस भारतीय टीम के लोग इसके लिए ज्यादा सक्रिय हैं उन लोगों में से पटना के NMCH में कार्यरत DR. Vishvanath ने मेरी कुछ तस्वीरें खींची थी। जिसे इंटरनेशनल हेल्थ रिसर्च आर्गनाइजेशन - Comite International, Geneve (ICRC) के समाचार पत्र Physiopedia पर पब्लिस्ड किया गया था। इस समुह की वेबसाइट www.physiopedia.com अंग विच्छेदन और पुनर्वास पर अध्ययन करने के लिए फिजियोपिडिया द्वारा विकसित और वितरित किया जाने वाला वह ऑनलाइन माध्यम है जिस पर दुनिया भर के फिजियोथेरापिस्ट अपने अनुभवों को साझा कर सकते हैं। ताकि न सिर्फ़ एक अध्ययन सामग्री के रूप में इस पत्रिका का विकास हो बल्कि फिजियोलॉजी से सम्बन्धित नये समाचारों से भी दुनियाँ भर के फिजियोथेरापिस्ट को अवगत कराया जा सके।
इस साइट पर दुनियाभर के किसी भी देश के फिजियोथेरापिस्ट फिजियोपिडिया के लिए साझा करने लायक सामग्रियों यथा कंटेंट्स, वीडियो क्लिप्स और फोटोग्राफ्स को अपलोड और सम्पादित कर सकते हैं।
Comite International, Geneve - ICRC की इस वेबसाइट पर Winging of scapula नामक मेरी लाइलाज़ बीमारी के लिए NMCH, Patna के डॉक्टरों की जिस टीम ने मेरी दायीं ओर के प्रभावित अंग की तस्वीरें ली थी उन तस्वीरों में से एक तस्वीर इस वेबसाइट पर भी अपलोड किया गया है।
जिसे संलग्न लिंक पर क्लिक कर के आप भी देख सकते हैं। वह लिंक है :👇
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| physiopedia.com पर मेरी लाइलाज़ बीमारी Winging of scapula के बारे में बताते हुए डॉक्टर का स्क्रीनशॉट |
जिस दिन मुझे डॉक्टरों ने कहा था - "Sorry! इसका कोई इलाज़ नहीं है। यह ऐसा बीमारी है जो धीरे-धीरे बढ़ता ही जाएगा। एकमात्र ईश्वरीय चमत्कार से ही यह ठीक हो सकता है। चाहे आप दुनियाँ के किसी भी हिस्से में चले जाइए, इसका कोई इलाज नहीं है। अतः मैं तो यही कहुंगा कि भारी चीज नहीं उठायें। नियमित रूप से फिजियोथेरैपी करवायें। लेकिन फिर भी संतुष्टि के लिए आपको जो-जो जाँच लिख रहा हूँ उसे करवा कर मुझसे मिलें।"
उस दिन डॉक्टर ने मुझे क्या-क्या बताया सब भूल गया, सिवाय उस बात के कि "अब इसका कोई इलाज नहीं है।" डॉक्टरों के उस बात को सुनते ही मैं घोर हताशा में डूब गया था। लगा कि समाज पर बोझ बन कर जीने से अच्छा है कि अपनी जिन्दगी ही खत्म कर लूं। मगर सहसा जैसे ही इस बात का ख्याल आया कि मेरे मरने से मेरी बर्बादी चाहने वाले लोगों को तो इससे खुशी होगी ही, मुझे ईश्वर ने जिस काम को पूरा करने के लिए यह जीवन दिया है उसे छोड़कर जाने के बाद ईश्वर को भी क्या मुँह दिखाऊंगा? बस इसी बात का ख्याल आते ही मैंने ठान लिया था कि चाहे जितने दिनों तक मैं जी सकूं, उतने दिनों के अन्दर अपने समाज के लोगों को जगाने का काम करुंगा। शोषित और वञ्चित लोगों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए आखिरी साँस तक संघर्ष करुँगा। जो अपनी पहचान तक भूल चुके हैं उन्हें उनकी असली पहचान बता कर के सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करूँगा। इसके लिए प्रयास करने के बजाए लोगों को "मैं बीमार हूँ, लाचार हूँ" कहने से कोई मेरी मदद तो नहीं करेगा उल्टे मेरी मजबूरी को कामचोरी करने के लिए बहाना बता कर मेरी निन्दा ही करेंगे। और यही मेरे साथ हो भी रहा है। ऐसी ही परिस्थिति में मेरे जैसे लोग टूट कर आत्महत्या कर लेते हैं।
आखिर कौन सी बीमारी हुई है मुझे जिसके बारे में सुनते ही मैं विचलित हो गया था और अस्पताल में ही फुट-फुट कर रोने के लिए मेरा कलेजा मचल उठा था? मगर लोग मुझे रोते हुए देख कर क्या समझेंगे, कौन मुझे ढांढ़स बँधाने आएगा? बस यही सोच कर लोक-लाज़ के कारण खुद को सम्भाला और भारी मन से उसी घर की ओर चल दिया जो मेरा कभी भी नहीं हो सका। हर पल मेरी बर्बादी की कामना करने वाली अपनी माँ और उसके ईशारा मात्र से मुझ पर दुश्मनों की तरह टूट पड़ने वाले परिजनों की चिन्ता छोड़ मुझे जीवन देने वाले भगवान से ही इसका कारण पूछने का निर्णय ले कर खुद को सम्भाल पाया था।
आखिर किस बीमारी के कारण NMCH, PMCH और IGIMS के डॉक्टर्स मेरी बीमारी को लाइलाज़ कह रहे हैं? उस बिमारी के बारे में जानने के लिए मैं कई दिनों से गूगल पर सर्च कर रहा था। आखिर एक दिन अचानक गूगल की एक साइट पर मुझे मेरी ही वह तस्वीर दिखाई दी जिसे मेरी जाँच करते समय NMCH के डॉक्टर विश्वनाथ और डॉक्टर एस.के. सिन्हा की यूनीट ने खींचा था। इस सम्बन्ध में जब अपने डॉक्टर से पूछताछ किया तब पता चला कि ऐसे मामले बहुत कम आते हैं। इसलिए आपकी फोटो रिसर्च के लिए खींच कर रख लिया था।
जाँच के दौरान जब डॉक्टरों ने एक किलो का वजनी सामान उठाने में भी बहुत ज्यादा ताकत लगाने की मेरी शिकायत की पुष्टि करने के लिए अपने प्रयोग के दौरान दाहिने हाथ पर जरा सा भी बल पड़ते ही मुझे दर्द से तिलमिलाते हुए देख चुका था। दाहिने हाथ से किसी भारी वस्तु को उठाने या खींचने से कन्धा को उखड़ने जैसा महसूस होने की शिकायत की पुष्टि दाहिने हाथ को बायें कन्धे की ओर करवा कर ही कर लिया था, तब डॉक्टरों ने मुझे दाहिने हाथ को हिलाने-डुलाने से भी मना करते हुए यह कहा था कि "यह बिमारी 3 लाख लोगों में से मात्र एक व्यक्ति को होता है। यह क्यों होता है इसके बारे में अभी तक कोई नहीं जान सका है। इसका कारण और इलाज़ पता करने के लिए पूरे विश्व में शोध हो रहा है। अतः मैं तो यही कहुंगा कि सतर्क रहिये। इस हाथ से एक किलो का भी सामान मत उठाइये और जहाँ तक हो सके भगवान से प्रार्थना कीजिए। क्योंकि कभी चोट लगने से आपकी नस दब गयी है और समय के साथ-साथ आपके शरीर के सभी अंग सूख जाएंगे।"
इस बात की जानकारी मेरे घर वालों को होते ही पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गयी और मेरी पत्नी जिसने अपने प्रेमी के साथ खुद को पकड़े जाने पर होने वाली बदनामी से बचने के लिए मुझे ही दहेज़ प्रताड़ना के झूठे केस-मुकदमों में फँसा कर जेल भेज दिया था, उसने कटाक्ष किया, "अभी क्या हुआ है, अभी तो तुममें कीड़े पड़ना बाकी है। देखते हैं कौन तुम्हारी मदद करता है।"
चुकि मेरी पत्नी के परिजनों ने ही अगमकुआं थाना प्रभारी प्रमोद कुमार झा की शह पर मेरे साथ मार-पीट कर के मेरी वह हाल कर दी थी, इसके बावजूद मैं ही दहेज़ प्रताड़ना का आरोपी बनकर ग्यारह वर्षों तक कोर्ट का चक्कर काटने के लिए मजबूर हुआ था। उस बीमारी के कारण मेरी रोजी-रोटी तो छिन ही गई थी, दहेज़ प्रताड़ना के आरोप में जेल जाने से समाज में बनी-बनाई इज्ज़त भी चली गई थी। कहीं कोई अपना नहीं दिख रहा था। विकलांगों जैसी स्थिति होने पर भी हर ओर अपने प्रति लोगों के मुँह से कटाक्ष और गालियाँ सुनने का मैं आदी हो गया था।
ऐसे में अपनी दवा और भोजन-पानी के लिए रुपयों की जुगाड़ करने के लिए चिकित्सकों के द्वारा पूर्ण विश्राम का निर्देश के बावजूद मुझे पेन किलर खा-खाकर अपनी बाइक स्वयं चलाते हुए काम करना पड़ रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरे कन्धों और बांह के नस पर्याप्त ताकत नहीं होने के कारण मेरी मोटरसाइकिल बार-बार दुर्घटनाग्रस्त हो जाती थी।........... क्रमशः


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