सोमवार, 25 मई 2026

Winging of Scapula एक असाध्य रोग

अंग विच्छेदन और पुनर्वास पर अध्ययन करने के लिए बनाये गये अन्तर्राष्ट्रीय वेबसाइट पर जब लोगों ने देखा मेरी तस्वीर 

✍️ प्रसेनजित सिंह

मैं Wringing of Scapula नामक जिस लाइलाज़ बीमारी से पिछले चार वर्षों से जूझ रहा हूँ उस पर अभी रीसर्च चल रहा है। दुनियाँ भर के फिजियोथेरापिस्ट इसका इलाज ढुंढने के लिए प्रयत्नशील हैं। डॉक्टरों के जिस भारतीय टीम के लोग इसके लिए ज्यादा सक्रिय हैं उन लोगों में से पटना के NMCH में कार्यरत DR. Vishvanath ने मेरी कुछ तस्वीरें खींची थी। जिसे इंटरनेशनल हेल्थ रिसर्च आर्गनाइजेशन - Comite International, Geneve (ICRC) के समाचार पत्र Physiopedia पर पब्लिस्ड किया गया था। इस समुह की वेबसाइट www.physiopedia.com अंग विच्छेदन और पुनर्वास पर अध्ययन करने के लिए फिजियोपिडिया द्वारा विकसित और वितरित किया जाने वाला वह ऑनलाइन माध्यम है जिस पर दुनिया भर के फिजियोथेरापिस्ट अपने अनुभवों को साझा कर सकते हैं। ताकि न सिर्फ़ एक अध्ययन सामग्री के रूप में इस पत्रिका का विकास हो बल्कि फिजियोलॉजी से सम्बन्धित नये समाचारों से भी दुनियाँ भर के फिजियोथेरापिस्ट को अवगत कराया जा सके। 
इस साइट पर दुनियाभर के किसी भी देश के फिजियोथेरापिस्ट फिजियोपिडिया के लिए साझा करने लायक सामग्रियों यथा कंटेंट्स, वीडियो क्लिप्स और फोटोग्राफ्स को अपलोड और सम्पादित कर सकते हैं।

Comite International, Geneve - ICRC की इस वेबसाइट पर Winging of scapula नामक मेरी लाइलाज़ बीमारी के लिए NMCH, Patna के डॉक्टरों की जिस टीम ने मेरी दायीं ओर के प्रभावित अंग की तस्वीरें ली थी उन तस्वीरों में से एक तस्वीर इस वेबसाइट पर भी अपलोड किया गया है। 
जिसे संलग्न लिंक पर क्लिक कर के आप भी देख सकते हैं। वह लिंक है :👇

यह लिंक मुझे इसलिए देना पड़ा हूँ ताकि मेरी बीमारी को बहाना कहने वाले लोगों को मेरी बातों पर यकीन हो सके। इसी लिंक के द्वारा फिजियोपेडिया नामक वेबसाइट पर जाकर आप भी देख सकते हैं मेरी संलग्न तस्वीर और विंगिंग आफ स्कैपुला (Winging of Scapula) नामक मेरी असाध्य बीमारी के बारे में विस्तृत जानकारी।

physiopedia.com पर मेरी लाइलाज़ बीमारी Winging of scapula के बारे में बताते हुए डॉक्टर का स्क्रीनशॉट

जिस दिन मुझे डॉक्टरों ने कहा था - "Sorry! इसका कोई इलाज़ नहीं है। यह ऐसा बीमारी है जो धीरे-धीरे बढ़ता ही जाएगा। एकमात्र ईश्वरीय चमत्कार से ही यह ठीक हो सकता है। चाहे आप दुनियाँ के किसी भी हिस्से में चले जाइए, इसका कोई इलाज नहीं है। अतः मैं तो यही कहुंगा कि भारी चीज नहीं उठायें। नियमित रूप से फिजियोथेरैपी करवायें। लेकिन फिर भी संतुष्टि के लिए आपको जो-जो जाँच लिख रहा हूँ उसे करवा कर मुझसे मिलें।" 
उस दिन डॉक्टर ने मुझे क्या-क्या बताया सब भूल गया, सिवाय उस बात के कि "अब इसका कोई इलाज नहीं है।" डॉक्टरों के उस बात को सुनते ही मैं घोर हताशा में डूब गया था। लगा कि समाज पर बोझ बन कर जीने से अच्छा है कि अपनी जिन्दगी ही खत्म कर लूं। मगर सहसा जैसे ही इस बात का ख्याल आया कि मेरे मरने से मेरी बर्बादी चाहने वाले लोगों को तो इससे खुशी होगी ही, मुझे ईश्वर ने जिस काम को पूरा करने के लिए यह जीवन दिया है उसे छोड़कर जाने के बाद ईश्वर को भी क्या मुँह दिखाऊंगा? बस इसी बात का ख्याल आते ही मैंने ठान लिया था कि चाहे जितने दिनों तक मैं जी सकूं, उतने दिनों के अन्दर अपने समाज के लोगों को जगाने का काम करुंगा। शोषित और वञ्चित लोगों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए आखिरी साँस तक संघर्ष करुँगा। जो अपनी पहचान तक भूल चुके हैं उन्हें उनकी असली पहचान बता कर के सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करूँगा। इसके लिए प्रयास करने के बजाए लोगों को "मैं बीमार हूँ, लाचार हूँ" कहने से कोई मेरी मदद तो नहीं करेगा उल्टे मेरी मजबूरी को कामचोरी करने के लिए बहाना बता कर मेरी निन्दा ही करेंगे। और यही मेरे साथ हो भी रहा है। ऐसी ही परिस्थिति में मेरे जैसे लोग टूट कर आत्महत्या कर लेते हैं। 

आखिर कौन सी बीमारी हुई है मुझे जिसके बारे में सुनते ही मैं विचलित हो गया था और अस्पताल में ही फुट-फुट कर रोने के लिए मेरा कलेजा मचल उठा था? मगर लोग मुझे रोते हुए देख कर क्या समझेंगे, कौन मुझे ढांढ़स बँधाने आएगा? बस यही सोच कर लोक-लाज़ के कारण खुद को सम्भाला और भारी मन से उसी घर की ओर चल दिया जो मेरा कभी भी नहीं हो सका। हर पल मेरी बर्बादी की कामना करने वाली अपनी माँ और उसके ईशारा मात्र से मुझ पर दुश्मनों की तरह टूट पड़ने वाले परिजनों की चिन्ता छोड़ मुझे जीवन देने वाले भगवान से ही इसका कारण पूछने का निर्णय ले कर खुद को सम्भाल पाया था। 

आखिर किस बीमारी के कारण NMCH, PMCH और IGIMS के डॉक्टर्स मेरी बीमारी को लाइलाज़ कह रहे हैं? उस बिमारी के बारे में जानने के लिए मैं कई दिनों से गूगल पर सर्च कर रहा था। आखिर एक दिन अचानक गूगल की एक साइट पर मुझे मेरी ही वह तस्वीर दिखाई दी जिसे मेरी जाँच करते समय NMCH के डॉक्टर विश्वनाथ खींचा था। इस सम्बन्ध में जब अपने डॉक्टर से पूछताछ किया तब पता चला कि ऐसे मामले बहुत कम आते हैं। इसलिए आपकी फोटो रिसर्च के लिए खींच कर रख लिया था। 

जाँच के दौरान जब डॉक्टरों ने एक किलो का वजनी सामान उठाने में भी बहुत ज्यादा ताकत लगाने की मेरी शिकायत की पुष्टि करने के लिए अपने प्रयोग के दौरान दाहिने हाथ पर जरा सा भी बल पड़ते ही मुझे दर्द से तिलमिलाते हुए देख चुका था। दाहिने हाथ से किसी भारी वस्तु को उठाने या खींचने से कन्धा को उखड़ने जैसा महसूस होने की शिकायत की पुष्टि दाहिने हाथ को बायें कन्धे की ओर करवा कर ही कर लिया था, तब डॉक्टरों ने मुझे दाहिने हाथ को हिलाने-डुलाने से भी मना करते हुए यह कहा था कि "यह बिमारी 3 लाख लोगों में से मात्र एक व्यक्ति को होता है। यह क्यों होता है इसके बारे में अभी तक कोई नहीं जान सका है। इसका कारण और इलाज़ पता करने के लिए पूरे विश्व में शोध हो रहा है। अतः मैं तो यही कहुंगा कि सतर्क रहिये। इस हाथ से एक किलो का भी सामान मत उठाइये और जहाँ तक हो सके भगवान से प्रार्थना कीजिए। क्योंकि कभी चोट लगने से आपकी नस दब गयी है और समय के साथ-साथ आपके शरीर के सभी अंग सूख जाएंगे।" 
इस बात की जानकारी मेरे घर वालों को होते ही पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गयी और मेरी पत्नी जिसने अपने प्रेमी के साथ खुद को पकड़े जाने पर होने वाली बदनामी से बचने के लिए मुझे ही दहेज़ प्रताड़ना के झूठे केस-मुकदमों में फँसा कर जेल भेज दिया था, उसने कटाक्ष किया, "अभी क्या हुआ है, अभी तो तुममें कीड़े पड़ना बाकी है। देखते हैं कौन तुम्हारी मदद करता है।" 
चुकि मेरी पत्नी के परिजनों ने ही अगमकुआं थाना प्रभारी की शह पर मेरे साथ मार-पीट कर के मेरी वह हाल कर दी थी, इसके बावजूद मैं ही दहेज़ प्रताड़ना का आरोपी बनकर ग्यारह वर्षों तक कोर्ट का चक्कर काटने के लिए मजबूर हुआ था। उस बीमारी के कारण मेरी रोजी-रोटी तो छीन ही गई थी, दहेज़ प्रताड़ना के आरोप में जेल जाने से समाज में बनी-बनाई इज्ज़त भी चली गई थी। कहीं कोई अपना नहीं दिख रहा था। विकलांगों जैसी स्थिति होने पर भी हर ओर अपने प्रति लोगों के मुँह से कटाक्ष और गालियाँ सुनने का मैं आदी हो गया था। 

ऐसे में अपनी दवा और भोजन-पान
 के लिए रुपयों की व्यवस्था करने के लिए चिकित्सकों के द्वारा पूर्ण विश्राम का निर्देश के बावजूद मुझे पेन किलर खा-खाकर अपनी बाइक स्वयं चलाते हुए एक इण्डियन विलेजर की गुमशुदा बेटी का पता लगाने के लिए इंवेस्टीगेशन एण्ड सर्च का अपना पसन्दीदा काम शुरू करना पड़ा था। इसके लिये मैंने एड़ी-चोटी एक कर दिया था। जिनकी बेटी अपने घर से अचानक लापता हो गई थी वे 60-65 साल की विधवा थीं। उनके बारे में एक व्हाट्सएप ग्रुप के द्वारा पता चला था कि उनकी बेटी पन्द्रह दिनों से लापता है लेकिन पुलिस-प्रशासन उनकी मदद नहीं कर रही है। जिस व्हाट्सएप ग्रुप से मुझे इसकी जानकारी हुई थी उसने सामाजिक संगठनों और समाजसेवियों को मृत घोषित करते हुए इस घटना पर अफसोस जताया था। तभी मेरे मन में उस परिवार की मदद करने की इच्छा जागृत हुई थी और अपने मित्रों के साथ मामले की सच्चाई जानने के लिए पीड़ित परिवार के घर पर पहुंच गया था। उनकी आपबीती सुनने के बाद मैंने उनकी मदद करने का आश्वासन देते हुए इंवेस्टीगेटर और क्राइम रिपोर्टर के अपने पुराने अनुभवों का इस्तेमाल करने का निर्णय ले लिया था। इस कार्य में जहाँ भी जरूरत होती वहाँ एक साथ चलने के लिए मेरे दोस्तों ने मुझे वचन दिया था। क्योंकि मैंने अपनी बीमारी के कारण पिछले चार वर्षों से अपनी बाइक चलाना छोड़ दिया था और मँहगाई के इस युग में भाड़े की गाड़ी रिजर्व कर के इंवेस्टिगेटर का काम करना मेरे लिए सम्भव नहीं था। चुकी पीड़िता का घर मेरे घर से लगभग 18 किलोमीटर दूर था। वह भी ऐसे जगह पर जहाँ पहुंचने के लिए नीजी वाहन से आवागमन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। उस महिला की मदद करने के लिए मामले की प्राथमिक जानकारी एकत्र करना भी जरूरी था। जो सम्बन्धित अधिकारियों और आरोपित लोगों के परिजनों से मिले बगैर सम्भव नहीं था। इस कार्य में दो दिनों तक अपना समय देने के बाद जब मुझे ऐसा महसूस हुआ कि पीड़ित लोग सच्चाई को छुपा रहे हैं और फरारी के मामले को कभी गुमशुदगी तो कभी अपहरण का मामला बता रहे हैं तो उस मामले को बेकार का लफड़ा कहते हुए मेरे मित्रों ने उस मामले में मेरा साथ देने से मना कर दिया था। ऐसे में जिस अधिकारी से मिलने के लिए मैंने पहले ही अप्वाइंटमेंट ले रखा था उनसे मिलने के लिए मुझे न चाहते हुए भी अपनी बाइक खुद चलाना पड़ा था। जबकि डॉक्टरों ने मुझे वजनी सामान उठाने के लिए मना कर रखा था।

इसके लिए अपने पूर्व निर्धारित समय पर मैं तो आई.जी ऑफिस में पहुंच ही गया था लेकिन जिनकी सहायता करने के लिए मैंने वह मीटिंग निर्धारित की थी उन्होंने फ़ोन कर के आग्रह किया था कि उनके मामले में मैं जिस अधिकारी से भी मिलुं अपने साथ उन्हें भी जरुर रखूं। उनके इस जिद के कारण निर्धारित समय पर आई.जी के कॉल करने पर भी उनसे भेंट न कर पीड़ित दुखियारिन के आने का इंतजार करता रहा। जब वह पहुंची तब उस आईजी ने हमारे साथ होने वाली मीटिंग कैंसिल कर के अपने विभागीय मीटिंग में व्यस्त हो गया। इसके कारण उस महिला ने इतना हंगामा किया कि आई.जी असीस्टेंट अशोक कुमार सिन्हा ने उन्हें सरकारी कार्य में बाधा उत्पन्न करने के आरोप में गिरफ्तार करने की धमकी देते हुए अपने ऑफिस से खदेड़ दिया था। आईजी ऑफिस के लोग अपने जगह पर सही थें। उन्होंने मदद करने के लिए मुझे हर तरह का आश्वासन दिया था। लेकिन वह महिला पूर्व निर्धारित समय पर नहीं आकर खुद लापरवाही की थी। इसके बावजूद आई जी संजय कुमार सिंह ने 05:00-06:00 बजे के बीच मिलने का दूबारा समय दिया। तब तक गाँधी मैदान थाना और नजदीकी बैंक से सम्बन्धित अन्य लफड़ों को सुलझाने के लिए भी मुझे चलने का आग्रह करते हुए मेरी बाइक पर बैठने लगीं। तब मैंने अपनी बीमारी की जानकारी देते हुए उन्हें बैठाकर बाइक नहीं चला पाने की मजबूरी बताते हुए चार वर्षों के बाद पहली बार उनकी मदद करने के लिए ही बाइक निकालने का कारण और वह बाइक चलाने के कारण बढ़ते जा रहे दर्द की जानकारी भी उन्हें देते हुए माफ़ी माँग लिया था। लेकिन मेरी मजबूरी को अनसुना कर के मेरी बाइक पर जबरन बैठ कर गाँधी मैदान थाना आदि अन्य जगहों पर चलने के लिए जिद करने लगी थीं। मैंने पहली बार एक अनजान महिला को इस तरह जिद करते हुए देखा था। जिसे उनका भोलापन समझ कर न चाहते हुए भी उनको समझाने की कोशिश करना छोड़ दिया और वे जहाँ-जहाँ कहीं वहाँ-वहाँ उनको ढ़ोता रहा। देर रात घर लौटते ही मुझे पेन किलर लेना पड़ा। इसके बावजूद रात भर मुझे नींद नहीं आई। सुबह होने पर मैने महसूस किया कि मेरा हाथ ऊपर नहीं उठ पा रहा है। जरा सी हरकत करने पर भी दर्द से तिलमिला उठता हूँ। तब गुमशुदा लड़की के बारे में पता करने के लिए खुद ही फिल्ड में न जाकर सोशल वर्क और पत्रकारिता से जुड़े अपने मित्रों की मदद से टेलिफ़ोन के द्वारा छानबीन करवाता रहा। जब भी दर्द में कुछ कमी महसूस करता खुद भी अपनी बाइक लेकर निकल जाता था। संयोगवश मेरी मेहनत रंग लाई। मैं अपहरणकर्ता के रूप में आरोपित मुख्य व्यक्ति से सम्पर्क करने में सफल हो गया और उसे कोर्ट में हाजिर होने के लिए दबाव बनाने लगा। तब तक उसके लोकेशन की सूचना अपने मित्रों को देकर उस पर चौतरफा दबाव बनाने लगा तब बाध्य होकर उसने मुझे स्वयं सूचित किया कि मैं स्वयं सरेण्डर करने के लिए तैयार हूँ। इसके लिए अपने वकील से बात कर रहा हूँ।

संयोगवश एक दिन अचानक अयोध्या में बैठे मेरे ग्रुप का ही सेतु सिंह नामक युवक ने मुझे फ़ोन कर के बताया कि मुझे अभी-अभी सूचना मिली है कि अपहृत युवती रचना सिंह को लेकर फरार चल रहा युवक आज कोर्ट में सरेण्डर करने वाला है। इस सूचना के मिलते ही अपहरणकर्ता संजीत कुमार यादव के मुहल्ले में रहने वाले मेरे एक और मित्र ने कॉल कर के सूचित किया कि संजीत और रचना एक घण्टे के अन्दर सीविल कोर्ट में सरेण्डर करने वाला है, वहाँ जल्दी पहुंचिये। इस कॉल के आते ही मुझे पुनः अपनी बाइक से ही कोर्ट की ओर निकलना पड़ा था। इसलिए नहीं कि अपहृत युवती के परिजनों से मुझे प्रेम था और इसलिए भी नहीं कि अपहरण के लिए आरोपित युवक से मेरी दुश्मनी थी। बल्कि इसलिए क्योंकि मेरे कारण कई लोग खुल कर इस मामले के उद्भेदन के लिए मेरी खुल कर मदद कर रहे थे। मेरे वहाँ नहीं जाने से मैं खुद उन लोगों की नजरों से गिर जाता। कोर्ट में पहुंचते ही मैंने देखा कि इस मामले में मेरा साथ दे रहे 7-8 लोग वहाँ पहले ही पहुंच चुके थे। अपहृत कही जा रही युवती जो स्वयं प्रेम प्रसंग के चक्कर में स्वेच्छा से अपने घर से फरार हुई थी, वह भी महिला पुलिसकर्मियों के साथ कोर्ट के बरामदे में अपने कॉल का इंतजार कर रही थी। मैंने उससे मिल कर उसके प्रेमी के बारे में जानकारी देते हुए यह बताया कि वह पहले से ही शादीशुदा और चार बच्चों का बाप है। जिस तरह से पहली पत्नी और बच्चों से पिछले चार वर्षों से कोई मतलब नहीं रखता है उसी तरह किसी और के मिलते ही तुम्हें भी छोड़ देगा। अतः कोर्ट में बयान देते समय यह जरूर कहना की "मैं स्वेच्छा से इनके साथ जरूर भागी थी लेकिन जब विवाह करने के बाद मुझे पता चला कि यह पहले से शादीशुदा और 3-4 बच्चों का बाप है तब मुझे खुद के ठगे जाने का अहसास हुआ। अतः अब इसके साथ नहीं बल्कि अपनी माँ के साथ रहना चाहती हूँ। इसे इसकी धोखाधड़ी करने की सजा मिलनी चाहिए।" बस इसी बयान के आधार पर वह लड़की उसकी माँ को सौंप दी गई। इस तरह एक महीने के अन्दर जिसके साथ उनकी बेटी स्वयं भाग कर गयी थी उससे सम्पर्क स्थापित करने और उन लोगों को समझाने के बाद उनकी बेटी को कोर्ट में हाजिर करवा कर उसके परिजनों तक पहुंचाने का भी काम पूरा कर दिया था।

इस दौरान चार वर्षों से बेरोजगार होकर घर में बैठने की मजबूरी के बावजूद तमाम सरकारी सुविधाओं से भी वंचित होने के बाद भी अपनी जमा पूँजी निकाल-निकाल कर जिस विधवा की सहायता करने के लिए भाग-दौड़ करता रहा उसने अपने अन्य लम्बित मामलों के निपटारे के लिए भी मुझसे मदद करने का आग्रह करने लगी तब मैंने उन्हें स्पष्ट कह दिया कि "मैंने लड़की के अपहरण का मामला समझ कर आपकी मदद किया था।" मुझे आपके कारण ही वह बाइक चलाना पड़ा जिसके कारण मेरी बीमारी फिर से बढ़ गयी है। इसके इलाज के लिए पैसे की जरूरत है। अतः मैं आपका काम तो करवा दुंगा लेकिन अब इसके लिए फी देना होगा। इस मामले से पहले मेरा यही प्रोफेशन था और इसके लिए मैं भारत सरकार के द्वारा रजिस्टर्ड हूँ। तब उन्होंने मुझे वचन दिया की आपकी जो भी फी होगी ले लीजिएगा लेकिन मेरा काम करवा दीजिए। चुकी मेरे एकाउण्ट के लगभग सभी पैसे खत्म हो गये थे इसके कारण मैंने उनसे एडवांस में कुछ पैसे जमा करने का आग्रह किया तो वे बहाने बना कर चली गई थीं। तब मैंने भी अपने स्वास्थ्य कारणों से कहीं आना-जाना बन्द कर दिया था। मुझे बार-बार फोन कर के घर में आकर भेंट करने के लिए बुलाने पर भी जब मैं विधवा महिला अनामिका किशोर के यहाँ नहीं गया तब एक दिन उनका बेटा मेरे घर में आकर माँ की मदद करने का आग्रह किया। तब न चाहते हुए भी उनकी माँ की कई लम्बित मामलों की पैरवी करने के लिए लगातार दो-तीन दिनों तक समय दिया। लेकिन जैसे ही पैसे की बात करता वे बहाने बनाने लगती। मैं समझ गया था कि वे लोग जरूरत से ज्यादा चालाक हैं। यही कारण है कि हर जगह उनका आसानी से होने वाला काम भी फँस जाता है। चुकि वह महिला मेरे ग्रामीण क्षेत्र की ही निकल गई थी जिसके कारण मैं उन पर पैसे के लिए दबाव नहीं बना पा रहा था। लेकिन उन्हें भी तो मेरी परेशानी समझनी चाहिए थी। एक दिन उनके जिद के कारण मुझे इतनी भीड़-भाड़ वाली गली में बाइक लेकर जाना पड़ गया जहाँ अपने दाहिने हाथ में हो रहे दर्द के कारण बाइक की हैण्डल नहीं सम्भाल पाया और दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। उसके कारण मेरी गाड़ी और हेलमेट तो क्षतिग्रस्त हुआ ही पहले से ही Winging of scapula से सबसे ज्यादा पीड़ित दाहिने हाथ में ही दुबारा चोट लगने से हमारी परेशानी और बढ़ गई थी। जिसका इलाज़ करवाने के लिए डॉक्टर का फी देने तक का पैसा अपने पास नहीं होने के कारण जब मैंने उस महिला से उनकी मदद करने के लिए किया गया खर्च माँगने लगा तब मोच बैठाने वाले से दिखवा देने की जिद कर के मुझे Pain Relief Spray लाकर दे दी। जबकि मैं जानता था कि मोच से नहीं बल्कि किसी और बीमारी से परेशान था और चोट लगने के कारण मेरी बीमारी विकराल रूप धारण करने वाली थी।

उस दुर्घटना के बाद मैं उनके बुलाने पर भी जब दुबारा उनकी मदद करने से इंकार कर दिया था तब एक दिन वे खुद हमारे घर पहुंच गई और क्षेत्रीय होने का वास्ता देते हुए कहने लगी कि "आप ही न कह रहे थे कि आपकी बेटी! मेरी भी बेटी है। अतः किसी भी तरह की परेशानी होगी तो मुझे जरूर बताइएगा। जहाँ तक होगा आपकी मदद जरूर करेंगे। फिर ऐसा क्या हुआ कि आप मेरा कॉल रीसिव करना भी छोड़ दिये? बिना मेरी सूचना के मेरे बैंक एकाउण्ट में से जो पैसे गायब हो गए हैं, सिर्फ़ उसकी रिकवरी करवा दें। फिर आप जितनी कहेंगे उतनी फी आपको दे देंगे।" इस पर मैं उन्हें बार-बार समझाता रहा कि आपके एकाउण्ट का पैसा किसी और ने नहीं बल्कि आपकी अपनी बेटी ने ही निकाला है। ऐसे में बैंक पर दबाव देना उचित नहीं है। लेकिन वे मानने के लिए तैयार नहीं हुई।... और अगले दिन बैंक मैनेजर पर इसके लिए दबाव बनाने का वचन लेने के बाद ही मेरे घर से वापस गयी। मुझे उनकी गिड़गिड़ाहट पर तरस खाकर खुद बीमार होने पर भी उनकी मदद करने के लिए जाना पड़ता था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी बीमारी और बढ़ गई है तथा मैं फूल टाइम बेडरेस्ट के लिए मजबूर हो गया हूँ।

अब मसाढ़ी के उदय किशोर सिंह की विधवा पत्नी अनामिका किशोर अपनी बेटी की बरामदगी के बाद मुझे इनाम या सम्मान देने के बजाय यह आरोप लगा रही हैं कि मैं उनकी बेटी को भगा कर ले जाने वाले युवक का ही साथ दे रहा हूँ। इसी के कारण उन लोगों के द्वारा बार-बार बुलाने पर भी उन लोगों के पास नहीं जा रहा हूँ। जबकि हकीकत यह है कि मैं वाकई में बहुत ज्यादा परेशान और तनाव में हूँ। अपने स्वास्थ्य कारणों से ही घर से नहीं निकल पा रहा हूँ।

मैं हनुमान तो हूँ नहीं जो सीना चीड़ कर दिखा दूँ। आज तक आप लोगों से अपनी बीमारी के बारे में न बता कर सामाजिक गतिविधियों में इसलिए मग्न रहता था ताकि अपनी जिन्दगी को जी भर के जी सकूं। अन्यथा बीमारी को याद कर-कर के निर्दयी और निष्ठुर हो चुके लोगों से चर्चा करने से मानसिक तनाव और बढ़ेगा ही। जिसके लिए अपने स्वास्थ्य की परवाह किये बगैर तन, मन, धन सब कुछ लगा दिया जब वैसे लोग भी धोखेबाज़ निकल गये तो समाज के अन्य लोगों से क्या आशा करूं?

फत्तेपुर वासी सतीश जी की माँ पटना के NMCH में इलाज़रत हैं। उन्हें डॉक्टरों का सहयोग नहीं मिल पा रहा है, इसके लिए सतीश जी ने Bargayan Warriors are नामक हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्यों से मदद की गुहार लगाये थे। लेकिन यह पहला अवसर है जब चाह कर भी उनकी मदद नहीं कर पाया। इसके कारण वे नाराज़ होकर मुझसे आग्रह किया हैं कि "प्रसेनजित जी! जब मेरी मदद नहीं कर सकते हैं तो इस ग्रुप से मुझे बाहर कर दीजिए।" लेकिन बहुत ही दुख की बात है कि इस ग्रुप के लोग उन्हें मदद करना तो दूर सांत्वना देना भी जरूरी नहीं समझे और दूसरे लोगों के अनावश्यक सन्देश भेज-भेज कर अपनी विद्वता का बखान करते रहे। अतः बन्धुओं से आग्रह है कि कृप्या संकटग्रस्त लोगों की मजबूरियों को भी समझें। उनके दुःख में साथ दें। मैं चाहता था कि मेरे मरने के बाद कोई भी व्यक्ति यह न कहे कि प्रसेनजित ने बूरे समय में मेरा साथ नहीं दिया है। लेकिन लगता है कि काल को अब यही मंजूर है। विशेष क्या कहूँ? जिन्दा रहा तो फिर मिलेंगे।

किश्तियां बह जाती हैं जब तूफां चले आते हैं।
यादें रह जाती हैं जब इंसां चले जाते हैं।। ✍️


गुरुवार, 4 सितंबर 2025

लघुकथा : अन्तहीन त्रासदी

लेखक  : प्रसेनजीत सिंह 

माँ-बाप की सेवा करने वाले को आशिर्वाद ही मिलता है ऐसी बात नहीं है। सत्यानन्द ने तो अपने माँ-बाप की खूब सेवा की थी, मगर उसके घर पर आये दो साधुओं ने तीसरी कक्षा में पढ़ रहे सत्यानन्द की ओर ईशारा करते हुए उसकी माँ से जैसे ही कहा कि "यह नाग अपने माता-पिता के वृद्ध होने पर तलवार से गर्दन काट कर हत्या कर देगा। अपनी सुरक्षा चाहती हैं तो इसे मुझे दे दीजिए।" उस समय तो उसकी माँ ने उस साधु की बात पर विश्वास नहीं किया था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे सत्यानन्द के प्रति उसकी माँ के मन में नफ़रत का भाव बढ़ता जा रहा था। अपने बेटे के हाथों अपनी होने वाली हत्या की कल्पना कर के उसके प्रति घृणा बढ़ती जा रही थी। सत्यानन्द के पिता जो भारतीय रिजर्व बैंक में उस समय सहायक कोषपाल थे, घर में पैसे की कमी नहीं थी, फिर भी उसे शिक्षा-दीक्षा रोक कर घर की सेवा में लगा दिया गया था। राजधानी पटना में रहते हुए भी नजदीकी गाँव में रहने वाले यादवों के लड़कों के साथ दिन भर गाय चराता, घर के बगल में स्थित आटा चक्की की दुकानों के बन्द रहने पर भी उसे गेहूं पिसवा कर ही लौटना पड़ता। पटना में स्ट्राइक रहने के कारण सभी मीलों और दुकानों के बन्द रहने पर भी चाहे जहाँ से भी हो गेहूंँ पिसवा कर ही लौटना पड़ता था। अन्यथा बिना काम पूरा किये वापस लौटने पर अपनी माँ और बड़े भाई से मार खाने के लिए तैयार रहना पड़ता था। पटना के लगभग सभी मील वाले उसकी इस मजबूरी के बारे में जान गये थे, इसके कारण कोई न कोई खतरे मोल लेकर उसकी मदद कर ही देता था। वापस लौटने पर घर से कुछ दूरी पर स्थित कुँए से पानी भर-भर कर नाद और ड्राम को भरना पड़ता, कुएं से पानी भर-भर कर ही बन रहे मकान की दीवारों को पटाना पड़ता। इसके बाद भी कोई न कोई बहाना बनाकर खाना खाने से पहले, खाना खाते-खाते और खाना खाने के बाद भी पिटाना ही पड़ता था। यही उसका रोज़ का नियम बन गया था।

उसे नमकीन के बजाए मीठा भोजन ज्यादा पसन्द था। इसके बावजूद घर में मिठाई आदि आने पर उसकी माँ उसे सत्यानन्द से छुपा कर रखती थी। कई बार तो उसके सामने ही अपने अन्य बच्चों और घर में आये हुए रिश्तेदारों में उन मिठाईयों को बाँट देती, लेकिन उसे यह कह कर भगा देती थी कि "तू हम्मर गर्दन काटबेऽ आउ हम तोरा मिठाई खिलइयऊ"?.. और उसे फिर किसी काम में फँसा देती थी। लेकिन जब कोई मिठाई खराब हो जाता तो बड़े प्रेम से उसे अपने पास बुलाती और कहती, "तोरा मिठाई अच्छा लग हउ नऽ?.. ले, ओन्ने जाके खा लेऽ। न तऽ कोनो छीन लेतउ।" उस मिठाई से आ रही दुर्गन्ध के कारण सत्यानन्द वह मिठाई नहीं लेना चाहता तब उसकी माँ कहती, "तोरे ला नुका के रखले हलियऊ। लेकिन यादे हेरा गेलियऊ हल बेटाऽ। जादे खराब न हबऽ, बस ऊपर से पोछ दीहऽ।" कह कर खुद ही अपनी मिठाई को पोछ देती और कहती -" बढ़ियां हो गेलई नऽ, लऽ अब खा लऽ।"

खराब हो कर जाला लग चुके मिठाई को मुँह से लगाते ही मुँह का स्वाद खराब हो जाता था। लेकिन अपनी माँ की झूठी ही सही मगर उसके क्षणिक प्यार का सुख भोगने के लिए वह उस मिठाई की कड़वाहट को भूल कर के माँ की ममता का प्यास मिटाने के लिए उस मिठाई के साथ माँ के द्वारा दिये गये सभी रोटियों को सुबक-सुबक कर रोते हुए खा जाता था। उसकी आँखों से आँसू इसलिए नहीं निकलते की उसकी माँ उसे न खाया जाने वाला चीज़ खाने के लिए मजबूर कर रही है, बल्कि वह यह सोच कर रोता था कि उसने कौन सा गुनाह किया है, जिसके कारण उसकी माँ भी उससे नफ़रत करती है।

उस समय उसके घर में संजय नामक जो नौकर था उसे वेतन और तीनों समय भोजन के अलावा साल में एक सेट नया कपड़ा भी दिया जाता, जबकि बेचारा सत्यानन्द को अपने पिता और भाईयों के छोड़े हुए पुराने कपड़े ही दिए जाते थे। यहाँ तक कि उसे अपने छोटे भाईयों के भी छोड़े हुए कपड़े पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। उस घर में उसकी जो औकात थी, उसे जानने के बाद सत्यानन्द के ननिहाल से आया हुआ घर का नौकर और किरायेदार भी नाजायज़ फायदा उठाते थे। साधुओं के द्वारा कही हुई भविष्यवाणी के भय से उसकी माँ के मन में बैठा हुआ विश्वास झूठा साबित हो जाए, सिर्फ इसके कारण वह घर के सभी जुल्मों को चुपचाप सहते हुए अपने जैसे मजबूर और दुखी लोगों की बाहर में मदद करता था। 

एक दिन अचानक बिना कोई पूर्व सूचना के उसकी तलाश करते हुए बिहार पिपुल्स पार्टी के किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव प्रमोद सिंह और प्रदेश उपाध्यक्ष राजकुमार सिंह अपने समर्थकों के साथ सत्यानन्द के घर चले गए, तब उनके साथ चल रहे लोगों के हाथों में राइफल्स देखते ही सत्यानन्द की माँ ने काँपते हुए उससे कहा था कि "तू मर काहे न जा हे रेऽ। काऽ कर के अइले हे, कि घर में डकैत घुस्सल जाइत हऊ?" लेकिन जैसे ही उन लोगों के बारे में सत्यानन्द के पिता को पता चला उन्हें आदर पूर्वक घर में बैठाकर चाय-नाश्ता करवाने लगे थे।

घर में ऐसे लोगों के आने से वह काफी दहशत में था। उसे इस बात का भय था कि, इन लोगों के जाते ही उसकी जम कर धुनाई होगी। लेकिन उसे अपने पास बुला कर पीठ ठोकते हुए जिस समय उसके पिता ने लोगों से कहा था कि "हम तो इसे मउगा समझते थे। घर में तो इसकी बोली, निकलती ही नहीं है। बाहर यह क्या राजनीति करेगा?" लेकिन उनके घर में आये हुए लोगों ने उनकी बात को काटते हुए जैसे यह कहा कि "ऐसी बात नहीं है, चचा! यह बहुत ही बहादुर लड़का है। इसी के कारण इन्हें पटना विधान सभा क्षेत्र का प्रचार प्रभारी बनाया गया है।" पटना मध्य से उम्मीदवार बनाये गये सुरेन्द्र श्रीवास्तव के घर में मीटिंग का आयोजन किया जा रहा है, उसकी तैयारी के लिए ही इनसे बात करने के लिए आये हैं। कल ही शाम में मोटरसाइकिल रैली भी निकालने की योजना है, उसके लिए भी इनके तरफ़ से कम से कम २०० मोटर साइकिल होना जरूरी है। इसकी व्यवस्था कैसे होगी, इसके बारे में भी मीटिंग में ही बताया जाएगा। इसलिए इनका उस मीटिंग में रहना जरूरी है।" ब्रह्मपुर के राजकुमार जी के द्वारा अपना मकसद खुल कर बताने के बाद वह पहला मौका था जब सत्यानन्द को अपने बगल में बैठाकर उसकी पीठ थपथपाते हुए उसके पिता ने शाबाशी दिया था। बड़े गर्मजोशी के साथ वे सत्यानन्द की तारीफ करते हुए पहली बार कहे थे, "आखिर बेटा किसका है? इसकी बोली नहीं निकलती थी, इसके लिए ही हम इसे डाँटते-डपटते रहते थे। अच्छा है इसका कण्ठ खुल गया। सब काली मइया की कृपा है। इस पर थोड़ा ध्यान दीजिएगा, छोटी-छोटी बातों से भावुक हो जाता है यह।" उस दिन सत्यानन्द को पहली बार महसूस हुआ था कि उस घर में उसे कोई चाहने वाला भी है।

सत्यानन्द के कारण बिहार के स्वास्थ्य मंत्री डॉ नरेन्द्र सिंह, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा में उत्तर प्रदेश के महामंत्री सह उत्तर प्रदेश के सहकारिता मंत्री प्रेम प्रकाश सिंह, उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष शिवराम सिंह गौड़, उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष उमाशंकर सिंह गहमरी, बिहार के प्रदेश अध्यक्षराराम शंकर सिंह, युवा मंच के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल सिंह, बिहार पिपुल्स पार्टी के अध्यक्ष आनन्द मोहन, भारतीय जनता पार्टी, पटना के सांसद सीपी ठाकुर, बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, आरा के विधायक अमरेन्द्र प्रताप सिंह, पटना मध्य के विधायक अरूण कुमार सिन्हा सहित कैलाशपति मिश्र, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, इन्दर सिंह नामधारी, राम विलास पासवान, राम कृपाल यादव, गुलाम गौस, संजय पासवान, पप्पू यादव और सैय्यद मुशीर अहमद जैसे लोगों के साथ मंच साझा कर चुके सत्यानन्द के बारे में काफी लम्बे अन्तराल के बाद जब उनके पिता को यह पता चला था कि उनका बेटा भाजपा निवेशक मंच के प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य सहित बाढ़ जिला समिति के महामंत्री के रूप में बहुत अच्छा काम कर रहा है, तब भी उसे अपने पिता का आशिर्वाद मिला था।

यादवों और राजपूतों के बीच छिड़े खूनी संघर्ष के दौरान अपनी जान की परवाह किये बगैर सत्यानन्द ने जिस तरह से अपनी जान पर खेल कर उस लड़ाई को खत्म कराया था, उसके कारण उसके गाँव के राजपूतों और पड़ोसी गाँव के यादवों के द्वारा भी सत्यानन्द को मुखिया का चुनाव लड़ने के लिए दबाव बनाया गया था। उस समय सत्यानन्द के पिता भी उसके साथ थे और उन दिनों अखबारों में आये दिन आने वाले सत्यानन्द के कार्यक्रमों की सूचनाओं से गौरवान्वित होते हुए अपने मित्रों के सामने अक्सर कहते भी थे कि यह लड़का सच्चा समाजसेवी है। उनकी इन तारिफों से ही सत्यानन्द घर की सारी शिक्वा-शिकायत को भूल जाता था। मगर नोमिनेशन के लिए लाये हुए उसके फार्म में उसके बड़े भाई ने चुपचाप अपनी पत्नी का डिटेल भर कर नोमिनेशन के दिन यह कहा कि तुम अगली बार चुनाव लड़ना, फार्म अपनी पत्नी के नाम से भर दिए हैं। तब सत्यानन्द को ऐसा लगा कि उसके पैरों के नीचे से किसी ने जमीन खींच लिया है। हालांकि वह चाहता तो दूसरा फार्म लाकर भी अपना नोमिनेशन करवा सकता था। जन समर्थन तो उसके पक्ष में था ही। लेकिन उसे जैसे ही यह पता चला कि उसके बड़े भाई ने यह सब अपनी माँ के कहने पर किया है, सत्यानन्द का सारा जोश ठण्डा पड़ गया था। घर के अन्दर होने वाले झगड़ों की बातें बाहर आने से उसकी बदनामी न हो, इसके लिए उसने न चाहते हुए भी अपने बड़े भाई का ही साथ दिया था। इसके लिए उसका मकसद सिर्फ़ इतना ही था कि उसे अपना दुश्मन समझने वाली उसकी माँ खुश हो जाये। चुनाव तो हुआ लेकिन वोटिंग के दिन सबके सामने अपने बड़े भाई के द्वारा अपमानित होने के कारण गाँव की मन्दिर में जाकर फूट-फूट कर रो रहे सत्यानन्द जी के साथ किये गये छल की बात जानते ही उनकी समर्थित उम्मीदवार समझ कर उनकी भाभी को वोट देने वाले लोग उसी गाँव के अन्य उम्मीदवार को वोट देने लगे और मतगणना होने पर उनके नाम पर वोट पाने वाली उनकी भाभी मात्र १२५ वोटों से हार गई थी। जिसका ठीकरा भी सत्यानन्द जी पर ही फोड़ते हुए उनके साथ दूबारा मार-पीट शुरू कर दिया गया था। उनके हिस्से की जमीन बेच कर उन्हें घर से भगा दिया गया था। 

सत्यानन्द के पिता के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद 35 साल पहले साधुओं के द्वारा कही गई बातों को ध्यान में रख कर उसे अपने पिता के आस-पास फटकने भी नहीं दिया गया था। एक दिन उसके पिता जब खुद ही सत्यानन्द के कमरे में आ गए थे तब उसे अपने बड़े भाई का कोपभाजन होना पड़ा था। आखिर उसकी अनुपस्थिति में ही सत्यानन्द के पिता की मृत्यु हो गई। मगर उसकी माँ जो जीवित है, वह 35 साल पहले कहे गए उस साधु की बातों को याद कर के आज भी यही मानती है कि तलवार से गर्दन काट कर उसका मंझला लड़का ही उसकी हत्या करेगा। इस भय से वह हमेशा उससे दूर रहती है और उसे मरवाने के लिए हमेशा नये-नये जाल बुनती रहती है। जबकि उसकी माँ भय के कारण समय से पहले ही न मर जाए, इसके लिए अब सत्यानन्द भी अपनी माँ से जानबूझकर दूर रहता है। हालांकि इस बदनसीबी के कारण उसे जब भी एकांत मिलता है अफर-अफर कर खूब रोता है।

मैं देख चुका हूँ कि माँ-बाप की सेवा करने के बाद भी आशिर्वाद नहीं मिलता है। जिसके नसीब में दुख लिखा है, उसे चाह कर भी सुख नहीं मिल सकता है। हमारे किस्मत की चाभी सिर्फ परमात्मा के हाथों में है। सेवा करनी है तो दीन-दुखी और जरूरतमंदों की करनी चाहिए। ऐसे लोगों के हृदय से निकला आशिर्वाद ही फलदायी होता है। लेकिन माता-पिता के द्वारा दिया गया श्राप भी जरूर लगता है। 




गुरुवार, 21 जुलाई 2022

हिन्दी की दुर्दशा के कारण और समाधान


कब तक होता रहेगा हिन्दीभाषी लेखकों, अनुवादकों और प्रूफ़रीडर्स से बन्धुआगिरी? 

किस्सा Hindi और English के मिश्रित भाषा "Hinglish" के शुरुआत की


सरकारी उदासीनता के कारण हिन्दी लेखकों को दिहाड़ी करने वाले अशिक्षित मजदूरों से भी कम दिया जाता है पारिश्रमिक

सृजनात्मक लेखन के कार्य आसान नहीं हैैं मगर लेखकों के सहज और स्वभाविक उत्पाद होने के कारण उन्हें इसके लिए उतना मशक्कत नहीं करना पड़ता है जितना उसे प्रकाशित करने योग्य बनाने वाले प्रूफ़रीडर्स और अनुवादको को। दूसरे लेखकों की भावना को समझते हुए उसी तरह के भाव प्रकट करने वाले एक-एक शब्द का दूसरे भाषा में अनुवाद करना कठिन कार्य है। इसके लिए वाकई में हिन्दी भाषा के प्रूफ़रीडर्स और अनुवादकों को जो पारिश्रमिक मिल रहा है वह अपर्याप्त तो है ही हम हिन्दीभाषियों के लिए शर्मनाक भी है। 

मैं अनुवादक (ट्राँसलेटर) तो नहीं हूँ, मगर हिन्दी भाषा का लेखक और प्रूफ़रीडर जरूर हूँ। ट्राँसलेटर की तरह ही प्रूफ़रीडिंग का काम भी कठिन मानसिक परिश्रम करने वाला है। कभी-कभी तो यह इतना ऊबाऊ हो जाता है कि अनावश्यक शब्दों और वाक्यांशों को हटाने के कारण अपनी बेइज्जती समझने वाले लेखकों और सम्पादकों के दबाव के कारण अनावश्यक शब्दों और वाक्यांशों को कहां से उठाकर कहां सेट करना है इसका निर्णय करना प्रूफ़रीडिंग के कार्य करने वाले लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। इसके कारण जिस तरह के श्रम प्रूफ़रीडिंग करने वाले लोगों को करना पड़ता है उसके लायक पारिश्रमिक नहीं मिलने से अधिकांश लोग अपने कार्य में जानबूझ कर लापरवाही बरतने लगते हैं। ऐसा हिन्दी भाषा की अच्छी समझ नहीं रखने वाले उन हिन्दीभाषियों की जिद के कारण हो रहा है जो अन्य विषयों की बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर खुद को हिन्दी भाषा के भी विद्वान समझने लगते हैं। ऐसे ही विद्वानों की सूची में हैं बिहार के पटना जिला में स्थित Good Man Publications के मालिक प्रो. आर के सिन्हा। 

प्रो. आर के सिन्हा बिहार यूनिवर्सिटी में इंग्लिश से एम.ए. करने के बाद मेरे गाँव के बगल में स्थित ज्योति कुंवर महाविद्यालय नामक ऐसे कॉलेज में प्रोफेसर बन गये जो साल में सिर्फ़ दस दिन ही खुलते हैं। बाकि समय में बेतहाशा कमाई करने के लिए इन्होंने स्वलिखित इंग्लिश ग्रामर एण्ड ट्रान्सलेशन के कई किताब की मार्केटिंग करने के लिए अपना प्रेस भी खोल लिए थे। यहाँ तक तो ठीक है लेकिन इन्होंने हद तब पार कर दिया जब हिन्दी-इंग्लिश दोनों भाषाओं में लिखे गये अपने पुस्तकों में हिन्दी व्याकरण के सम्बन्ध में गलत जानकारी देने लगे। इन्होंने अपने पुस्तकों के द्वारा हिन्दी व्याकरण की बखिया उधेड़ने का काम 1996 ईस्वी में प्रकाशित अपनी पुस्तक "Oxford Junior English TranslationOxford Junior English GrammarOxford Basic English Translation और Oxford Basic English Grammar" से ही कर दिया था। 

संयोगवश मुझे उनके प्रेस में प्रूफ़रीडर के रूप में काम करने का अवसर मिला। लेकिन मेरी नज़र जैसे ही बिहार में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली व्याकरण की उस पुस्तक में भरे हुए हिन्दी व्याकरण से सम्बन्धित अशुद्धियों और गलत जानकारी पर पड़ा, मैंने ईमानदारी पूर्वक प्रूफ़रीडिंग कर के कम्पोजर से मूल प्रति दिखाने का आग्रह किया था। लेकिन उसका जवाब सुनकर मुझे तब आश्चर्य हुआ जब उसने मुझे यह नसीहत देते हुए कहा कि मैं आपकी बातों से सहमत हूँ, लेकिन आपको अपनी नौकरी बचानी है तो प्रोफेसर साहब के लिखे हुए वाक्यांशों में काट-छांट या फेरबदल न करें। इससे उनके स्क्रिप्ट के अलावा कोई अन्य अशुद्धि दिखे तो सिर्फ़ उसे ही मार्क करें। कम्पोजर के समझाने के बाद भी मैने दिल की बात Good Man (P & T) के प्रोपराइटर और उसके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के लेखक प्रो. आर. के. सिन्हा से कह दिया था। लेकिन उनका जवाब सुनते ही मैं समझ गया था कि अपने भावों और विचारों को हिन्दी भाषा में शुद्ध-शुद्ध लिखने, पढ़ने और बोलने की शिक्षा देने वाले शास्त्र के खिलाफ़ आधुनिक शिक्षा के नाम पर जो दुष्प्रचार और साजिश चल रहा है उसके खिलाफ़ हिन्दीभाषी लेखकों और समाजसेवियों को जगाना होगा। फिर क्या था मैंने वहां से इस्तीफा दिया और हिन्दी लेखकों भुवनेश्वर गुरमैता और नामवर सिंह को चिट्ठी लिख दिया। लेकिन परिणाम वही हुआ - "ढाक के तीन पात"। 

हिन्दीभाषी लेखकों और पत्रकारों के द्वारा हिन्दी के वाक्य के अन्त में पूर्ण विराम के चिन्ह "।" की जगह इंग्लिश में इस्तेमाल होने वाले फूल स्टॉप के चिन्ह "." का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाने लगा। जो प्रो. आर. के. सिन्हा के द्वारा एक प्रयोग के तौर पर 1996 ईस्वी में शुरू किये गये Hindi और English के मिश्रित भाषा "Hinglish" की शुरुआत थी। 

आर. के. सिन्हा जैसे लोगों के पदचिन्हों पर चलने वाले हिन्दीभाषी लोगों के कारण ही आज हिन्दी भाषा के लेखकों और साहित्यकारों को वह सम्मान नहीं मिल रहा है जो हिन्दीभाषी लोगों के देश में इंग्लिश बोलने वाले लोगों को मिलता है। ऐसा सिर्फ इसी देश में है, जहाँ की राष्ट्रभाषा का दर्जा हिन्दी को मिलने के बाद भी खुद सरकारी एजेंसियां ही इंग्लिश में काम करने में गर्व महसुस करती है। ऐसे लोगों के कारण ही क्रियेटिव राइटिंग, प्रूफ़रीडिंग और ट्रांसलेशन के कार्य करने वाले हिन्दीभाषी लोगों को अन्य भाषा में कार्य करने वाले लोगों की अपेक्षा कम पारिश्रमिक दिया जाता है। 

हिन्दी भाषा के प्रूफ़रीडर और ट्रांसलेटर को कम से कम 50 पैसे/शब्द पारिश्रमिक देना चाहिए। यानी प्रति 1000 शब्दों के लिए न्यूनतम 500/- रुपये पारिश्रमिक तो देना ही चाहिए। यही शुल्क हिन्दीभाषी अनुवादकों को भी दिया जाना चाहिए। लेकिन मिलता है 300/- रुपये भी नहीं। इसके लिए देश और दुनियां की जानकारी के लिए बनने वाले देशी-विदेशी वेबसाइटों में मनपसन्द भाषा का चयन करने के लिए दिये जाने वाले आप्शन के रूप में हिन्दी भाषा को सेलेक्ट करने का विकल्प बहुत ही कम दिखाई देता है। इसके लिए भारत सरकार के सूचना, प्रसारण और संचार मंत्रालय को भी पहल करना चाहिये। लेकिन देश भर में हिन्दी दिवस मनाने के नाम पर खानापूर्ति करने के अलावा यह मंत्रालय हिन्दी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने या प्रचार-प्रसार के लिए जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं कर रहा है। 

मेरे ख्याल से हिन्दी भाषा के विकास के लिए सरकारी उदासिनता के कारण ही हिन्दी भाषी लेखकों और अनुवादकों के समक्ष भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई है। विदेशी भाषा सीखने और सिखाने के लिए दुनियां की सभी भाषाओं का सहारा लिया जाता है, लेकिन हिन्दीभाषी लोग विदेशी भाषा की शिक्षा हिन्दी भाषा में नहीं ले सकते हैं। इसका कारण है विदेशी भाषाओं को सिखाने वाले पुस्तकों के हिन्दी भाषा में अनुवाद, लेखन और प्रकाशन के कार्य के लिये विदेशी भाषा जानने वाले हिन्दीभाषी लेखकों और सरकार की उपेक्षा। 

वाकई में, हिन्दीभाषी लेखकों और अनुवादकों के प्रति सरकारी उपेक्षा के कारण ही हिन्दी भाषा के अच्छे विद्वान होने के बावजूद इंग्लिश या अन्य विदेशी भाषा नहीं जानने वाले लेखकों के समक्ष भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई है। यदि सरकार इस भाषा के विकास के लिए योजनाएं बना कर सही तरीके से लागू करवाये तो इस देश में बेरोजगारी की समस्या घट कर आधी हो जाएगी। इसके लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा किया था कि "अब हिन्दी भाषा में भी मेडिकल कोर्स कर सकेंगे हिन्दीभाषी लोग"। 

हिन्दी भाषा के विकास के लिए मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा किये गये घोषणा को कार्यान्वित करने के लिए मध्य प्रदेश की सरकार ने पहल शुरू किया या नहीं, इसके बारे में मुझे प्रमाणिक जानकारी नहीं है। लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी सभ्यता और संस्कृति का विकास हमारी मूल भाषा में ही अध्ययन-अध्यापन के द्वारा सम्भव है। यही कारण है कि इस देश के अलावा दुनियां के लगभग सभी विकसित देशों में वहाँ की मूल भाषा में ही पढ़ने-पढ़ाने का नियम है और इसे सख्ती के साथ लागू भी करवाया जाता है। लेकिन भारत सरकार के द्वारा अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति उदासीनता के कारण ही इस देश की बहुसंख्यक आबादी अपने ऊपर जबरन थोपे जाने वाले अंग्रेजी भाषा की समझ नहीं होने के कारण अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और उसका खामियाज़ा जिन्दगी भर भुगतने के लिए मजबूर होते हैं।

जिस तरह से फ्रांस में पढ़ने के लिये अच्छी इंग्लिश जानने वाले लोगों को भी वहाँ की फ्रेंच भाषा सीखना पड़ता है, रूस में पढ़ने के लिए इच्छुक लोगों को वहाँ की रसीयन भाषा सीखना पड़ता है, चाइना में पढ़ने के लिये इच्छुक लोगों को वहाँ की स्थानीय भाषा मन्दारी सीखना पड़ता है, उसी तरह से भारत में पढ़ने वाले छात्रों को भी अपनी राष्ट्र भाषा हिन्दी में ही अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था करवाने के लिये हिन्दीभाषी लेखकों को प्रोत्साहित करना चाहिये। कम से कम इसका प्रयास तो करना ही चाहिए। यदि ऐसा हो गया तो यकीनन इस देश की दुर्दशा जरूर खत्म होगी। लेकिन महाराष्ट्र और दक्षिण भारतीय राज्यों में रहने वाले कुछ तथाकथित लोगों के द्वारा हिन्दीभाषी लोगों के विरोध को देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकारें हिन्दीभाषी राज्यों में भी हिन्दी भाषा के विकास के मुद्दे पर मौन धारण कर रखा है। हिन्दी और हिन्दीभाषियों के विकास के लिए वहाँ की सरकारें भविष्य में भी कुछ करेगी ऐसा दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि हिन्दीभाषी लेखक और भाषाविद् आज 15 पैसे और 20 पैसे प्रति शब्द में भी कार्य करने के लिए मजबूर हो हैं। सच्चाई यही है इस देश के हिन्दीभाषी लेखकों की। इनकी पारिश्रमिक दिहाड़ी मजदूरी करने वाले अशिक्षित लोगों से भी कम है। इसके कारण हिन्दी भाषा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। 

आज हिन्दी भाषा को अवैज्ञानिक और पिछड़े हुए लोगों की भाषा समझने वाले लोगों के कारण ही हिन्दीभाषी पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और पुस्तकों को पढ़ने वाले लोगों की संख्या लगातार घटती जा रही है। नालन्दा ओपेन यूनिवर्सिटी की सिलेबस से सम्बन्धित हिन्दीभाषी पुस्तकों की घटिया भाषा शैली के कारण ही मैंने उसकी सभी पुस्तकों को कुलपति के समक्ष फाड़कर फेंकने के बाद उस संस्थान में नामांकित होने के बावजूद मैने वह कोर्स सिर्फ़ इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि पूरी शुल्क लेने के बाद भी उस यूनिवर्सिटी के पटना में स्थित शाखा के द्वारा मुझे इतना घटिया पाठ्य सामग्री दिया गया था जिसे देखते ही उस यूनिवर्सिटी के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के स्तर को मैं समझ गया था। शिक्षा के नाम पर सिर्फ़ कागज के सर्टिफिकेट बेचने की दुकान मात्र बन कर रह गई है नालन्दा ओपन यूनिवर्सिटी जैसी संस्थायें। 

ट्राँसलेटर तो किसी रचना को अनुवादित कर के प्रकाशक को सौंप देता है, लेकिन उसकी दो-तीन चरणों में कम्पोजिंग और प्रूफ़रीडिंग के कार्य करने के बाद ही कोई पुस्तक या पत्र-पत्रिका प्रकाशित कर के पाठकों तक पहुंचाया जाता है। अनुवादक चाहे लाख अच्छा हो, जो पत्र-पत्रिका और पुस्तक बिना प्रूफ़रीडिंग करवाये प्रकाशित की जाती है, वह सुन्दर से सुन्दर ग्राफिक डिजाइनिंग और पैकिंग के बाद भी पाठकों का विश्वास नहीं जीत पाता है। पाठक का दिमाग कोरा काग़ज़ की तरह बिल्कुल खाली हो तो अधकचरे ज्ञान का सर्टिफिकेट पाकर भी खुद को ज्ञानी समझने लगता है। आजकल ऐसे ही ज्ञानियों का चलन है। क्योंकि उन्हें सही शिक्षा मिली ही नहीं है। अतः हिन्दीभाषी लेखकों, अनुवादकों और प्रूफ़रीडिंग के कार्य करने वाले लोगों को भी अच्छी पारिश्रमिक देने का प्रयास करना चाहिए। तभी लोगों को सही, शुद्ध और विश्वसनीय ज्ञान भण्डार वाले पुस्तक प्राप्त होंगे।


शुक्रवार, 24 जून 2022

क्यों प्रसिद्ध है कटास राज

महाभारत की कथा में वर्णित कटाक्ष तीर्थ का स्थान है कटास राज बनाम कठ गणराज्य, कुम्भी बैस का विस्मृत इतिहास



महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित आदि ग्रन्थ महाभारत के वन पर्व में स्थित एक श्लोक के अनुसार भूनेत्र के नाम से प्रसिद्ध महातीर्थ  "कटाक्ष" वह स्थान है जो सभी पापों को धो देता है। इस महातीर्थ को धारण करने वाले राज्य को लोग कठ गणराज्य के नाम से भी जानते थे। हालांकि कठ गणराज्य का अस्तित्व तो नहीं रहा मगर पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित चकबल में कल्लर कहार मार्ग पर वह सरोवर आज भी है जहां एक यक्ष के सवालों का जवाब दिए बगैर सरोवर का पानी पीने का प्रयास करने पर पाण्डवों के भाई भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव अचेत कर दिये गये थे। बाद में युधिष्ठिर ने जब यक्ष के सभी सवालों का जवाब देकर यक्ष को सन्तुष्ट कर दिया तभी उस सरोवर का जल पी सके थे। यक्ष के कहने पर जिस सरोवर के अमृत तुल्य जल का छिड़काव कर के युधिष्ठिर ने अचेत पड़े अपने भाईयों की चेतना वापस लाये थे वही सरोवर है चकबल में कटास नामक तीर्थ स्थान में स्थित यह सरोवर। हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल कटास में प्रवेश करते ही "कटास राज चौक, श्री कटास राज मन्दिर और कटास राज अमृत कुण्ड" का बोर्ड दूर से ही दिखाई देता है।

कुछ जगहों पर पाकिस्तान सरकार के द्वारा लगवाये गए साइनबोर्ड को आप भी देख सकते हैं कि जिसमें लिखवाये गये सन्देश पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू के बजाए भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी और नये युग की अन्तरराष्ट्रीय भाषा में लिखे हुए हैं। ऐसा इसलिए लिखा गया है ताकि भारतीय पर्यटक! खासकर राजस्थान से आने वाले पर्यटक उन सन्देशों को आसानी से समझ सकें।
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एक साइनबोर्ड में स्पष्ट लिखा हुआ है - "महान और पावन तीर्थ धाम श्री कटासराज जी की यात्रा करने के लिए आने पर पाकिस्तान वक्फ़ बोर्ड की ओर से आपका स्वागत है।"
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उस पवित्र तीर्थ धाम के पास वक्फ़ बोर्ड के द्वारा लगवाये गये अन्य साइनबोर्ड में हिन्दी, इंग्लिश और उर्दू भाषा में भी लिखवाये गये सन्देशों से श्री कटास राज तीर्थ स्थान के बारे में पर्यटकों को जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने श्री कटासराज तीर्थ को भगवान शिव का तीर्थ माना है।

🗺️ (कटासराज मन्दिर में स्थित भगवान शिव जी की प्रतिमा और तस्वीरें)

कहते हैं कि माँ पार्वती! अपने पिता प्रजापति दक्ष के द्वारा अपने पति का अपमान नहीं सह पाने के कारण यज्ञ कुण्ड में कूद कर जब सती हो गयी, तब भगवान शिव के आँखों में छलक आये अश्रुबुन्द जिन दो जगहों पर गिरे थे, वहाँ पर पवित्र अमृत कुण्ड बन गये थे। भगवान शिव की आँखों में छलक आये आँसू के एक बुन्द राजस्थान के अजमेर नामक जिस भारतीय क्षेत्र में गिरा था वहाँ पर निर्मित पुष्कर सरोवर! तीर्थ स्थान पुष्कर राज के नाम से प्रसिद्ध हुआ तो भगवान शिव जी की आँखों से दूसरा अश्रुबुन्द जिस स्थान पर गिरा था, उस स्थान पर बना हुआ सरोवर "तीर्थ कुण्ड श्री कटाक्ष राज" के नाम से प्रसिद्ध हुआ लेकिन अब अपभ्रंश के कारण कटास राज कहलाता है।
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शिव जी के नेत्रों से गिरे दो अश्रु बन्दों से बने दोनों तीर्थ कुण्ड 1947 ईस्वी में हुए भारत के बंटवारे के बाद अब दो अलग-अलग देशों में स्थित है।

शास्त्रों में कटास-राज और पुष्कर-राज नामक तीर्थ स्थानों को भूनेत्र अर्थात धरती का नेत्र कहा गया है। लेकिन ऐसा क्यों कहा गया इसके लिए कौशिक कंसल्टेंसी इंटेलीजेंस ब्यूरो के द्वारा शोध किया जा रहा है। यजुर्वेद में श्री कटासराज धाम को सारस्वत प्रदेश में स्थित ब्रह्मावर्त कहा गया है। इस तीर्थ की महानता का प्रमाण आदि ग्रन्थ महाभारत में वर्णित उस घटना से मिलता है, जिसके बारे में लोगों की यह मान्यता है कि कटास-राज अमृत कुण्ड जो पहले एक आम सरोवर की तरह दिखाई देता था, उसी सरोवर के किनारे पाण्डवों के बड़े भाई युधिष्ठिर और उस सरोवर की रक्षा करने वाले यक्ष के बीच वह बहुचर्चित संवाद हुआ था, जिसके कारण यक्ष के द्वारा पूछे गए सभी सवालों के जवाब देकर युद्धिष्ठिर ने न केवल धर्मराज की पदवी पाया था, बल्कि इसी कटास राज सरोवर के पवित्र जल का छिड़काव कर के अचेत अवस्था में पड़े हुए अपने चारों भाईयों को पुनर्जीवित भी किया था। पाण्डवों के साथ घटित उस अविष्मरणीय घटना के कारण "कटास राज सरोवर" एक महान तीर्थ स्थल के रूप में संसार में अपनी सुगन्ध फैलाने लगा।

पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के जिला चकबल में कटाक्ष तीर्थ स्थल के पास बसने वाला कटास नामक वह प्राचीन गाँव आज भी है जहां पर स्थित हिन्दुओं के महान तीर्थ "कटास राज अमृत कुण्ड" 1947 ईस्वी में भारत का बंटवारा होने से पहले हिन्दु धर्म का मुख्य केन्द्र था। भारत का बंटवारा होने से पहले कटास राज मन्दिर के प्राङ्गण में हिन्दी और संस्कृत का महाविद्यालय भी स्थित था, जिसे बंटवारे के बाद बन्द करके स्थायी रूप से खत्म कर दिया गया है। लेकिन उस तीर्थ स्थल पर कटास राज का प्राचीन मन्दिर, श्री कटास राज अमृत कुण्ड के नाम से विख्यात सरोवर और महाविद्यालय के अवशेष अभी भी बचे हुए हैं। जिसकी देख-रेख पाकिस्तान वक्फ़ बोर्ड कर रही है।

इस तीर्थ स्थल हिन्दुओं के कम आवागमन के कारण अब श्री कटास राज कुण्ड के पानी का इस्तेमाल नहीं होने से उस कुण्ड के जल सतह पर सर्वत्र काई जम गया। इसके कारण भगवान शिव के प्रति आस्थावान लोगों के उस तीर्थ स्थान का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जिसे समय रहते नहीं बचाया गया तो इंसानियत की शुरुआत जिस एक परिवार से हुआ था उसका आखिरी अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा। फिर जाति, धर्म और समुदाय के नाम पर लड़ने वाले लोगों को कैसे यकीन दिलाया जाएगा कि सभी धरती वासी एक ही परिवार के सदस्य हैं?

देखें कहाँ है कटास राज मन्दिर👇
🏚️ Katas Raj Temples
PXF2+HMR, Kalar Kahar Rd, Katas, Chakwal, Punjab, Pakistan
https://maps.app.goo.gl/4T9j3hH2S5xtmeEs6


शनिवार, 18 जून 2022

अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम के उद्देश्य

अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम, Agnipath Recruitment, खोज़ी खबर


भारत सरकार की गृह मंत्रालय के अनुसार अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम के तहत अग्निवीर बनने वाले लोगों को आपात स्थिति में सामाजिक सहायता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये तैयार करना है। इस स्कीम के तहत न नई पीढ़ी के भारतीय नागरिकों को राष्ट्रीय एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने में सहायता करने के लिए तैयार करना है बल्कि गरीबी के कारण अच्छी शिक्षा, चिकित्सा और प्रशिक्षण देने वाला माहौल न मिल पाने के कारण बेरोजगारों को बड़गलाने वाले नेताओं और आपराधिक गिरोहों के बहकावे में आकर अपना जीवन बर्बाद करने वाले लोगों को बचाना भी है। भारत सरकार की इस दूरदर्शिता के कारण सभी भारतीय नागरिकों को केन्द्र सरकार की इस योजना में आगे बढ़ कर साथ देना चाहिए। लेकिन देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त काँग्रेस जैसे लूटेरों का साथ देने वाले गिरोहों के लोग अपनी शाख बचाने के लिए दंगा-फसाद, तोड़-फोड़ और आगजनी करके इस लोकहितकारी राष्ट्रीय योजना का विरोध कर रहे हैं। ताउम्र बन्धुआगिरी और बेरोजगारी से जूझने वाले लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि आखिर क्या कारण है कि आम लोग ताउम्र ईमानदारी पूर्वक मेहनत और मजदूरी कर के भी भविष्य के लिए एक लाख रुपये भी जमा नहीं कर पाते हैं, गम्भीर रूप से बीमार होने पर भी इलाज़ नहीं करवा पाते हैं, अपना घर नहीं होने के कारण या किराये का घर नहीं ले पाने के कारण छोटा-मोटा दुकान तक नहीं खोल पाते हैं। ऐसे में स्वरोजगार शुरू करने की बातें सोच भी नहीं पाते हैं। इस मंहगाई के दौर में भी मात्र छह-सात हजार रुपये मासिक वेतन पर गुजारा करते हैं। पूरे देश में प्राइवेट सुरक्षा गार्ड की नौकरी करने वाले लोगों में सर्वाधिक संख्या सवर्ण जाति के उन लोगों की है जिनके पास न तो रहने के लिए सुरक्षित घर है न ही खेती-बाड़ी करने लायक पर्याप्त जमीन। बहुत लोग ऐसे भी हैं जिनके पास एक झोपड़ी बनाने लायक भी जमीन नहीं है। इसके बावजूद पिछली सरकारों के द्वारा बनाए गए कानूनों के कारण सवर्ण जाति के लोगों को तमाम विकास योजनाओं का लाभ लेने से वंचित रखा जाता था। यहाँ तक कि सवर्ण जाति के गरीब-गुरबों की सहायता करने के लिए भी कोई मंच नहीं था। जबकि देश को पहले धर्म और फिर जाति और लिंग के आधार पर बांटने वाले नेहरू, इंदिरा और राहुल गाँधी जैसे नेताओं की तिजोरी में बिना कोई मेहनत-मजदूरी किये अरबों रुपये जमा हो जाते हैं। आखिर क्या कारण है कि नेतागिरी की आड़ में नौकरी लगवाने का धन्धा करने वाले लोग विदेशों में भी हवेलियां खड़ी कर लेते हैं, जबकि मेहनत मजदूरी करने वाले लोग खासकर सवर्ण जाति के अनारक्षित लोग ताउम्र एक झोपड़ी बनाने के लिए भी तरसते रहते हैं? आम नागरिकों को ऐसे गिरोहों के चंगुल में फँसने से बचाने के लिए भी भारत सरकार ने "अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम" शुरू किया है। 


हमें यह जानना चाहिये कि इस देश की भलाई चाहने वाले लोग नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों को लूट कर अपना खजाना भरने वाले लोगों के द्वारा ही भारत सरकार की इस योजना का विरोध किया जा है। अतः हमें देश विरोधी ताकतों के विरोध में खुल कर आगे आना चाहिए और केन्द्र सरकार की इस योजना का लाभ लेने के लिये अपने समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित करना चाहिए। अपने तमाम सपनों को पूरा करने का सामर्थ्य देने वाले इस योजना का लाभ लेने के लिए यदि सवर्ण समाज के गरीब-गुरबों को आगे लाया जाए तो राष्ट्रहित में ज्यादा अच्छा होगा। क्योंकि एकमात्र यही वर्ग है जो जातिय आरक्षण के कानून के द्वारा लगातार उपेक्षित होते हुए भी इस देश की सुरक्षा के लिये सबसे ज्यादा कुर्बानियां दे चुका है। इन बातों को गहराई से समझने के कारण ही माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने आर्थिक विकास के आधार पर आरक्षण का कानून बना कर पूरे देश में लागू करने का प्रयास किया था। लेकिन इस योजना को सवर्णों से घृणा करने वाले नेताओं ने अपने राज्यों में लागू नहीं होने दिया। जबकि ऐसी ही दूरदर्शिता के कारण ही अन्तरराष्ट्रीय मंच पर लगातार अगली पंक्तियाँ में खड़े रहने वाले प्रधानमंत्री के रूप में अपनी छवि बना कर माननीय मोदी जी इस देश का मान बढ़ा रहे हैं। इनके पहले भारतीय प्रधानमंत्री को कभी भी वह सम्मान नहीं मिला जो माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी के के नेतृत्व में मिल रहा है। अपने मंत्रालय में शामिल विद्वान, देशभक्त और ईमानदार नेताओं की टीम के साथ देश के वंचित लोगों की भी सहायता करने के लिए लगातार काम कर रहे मोदी जी विश्व के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित नेता के रूप में जितनी जल्दी पहचान बनाये हैं वह विश्व के टॉप टेन आश्चर्यों में सबसे बड़ा आश्चर्य है। यह देश से प्रेम करने वाले भारतीयों के लिए गर्व की बात है। लेकिन जिन लोगों को भारत को मिलने वाला यह सम्मान खटक रहा है, वे लोग हड़ताल और तोड़-फोड़ कर के भारत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा और अखण्डता सुनिश्चित करने के लिये शुरू की गई इस योजना को बन्द करने के लिए दबाव दे रहे हैं। अतः आम नागरिकों को भी देश में अराजक स्थिति उत्पन्न करने के प्रयास में लिप्त नेताओं का विरोध करते हुए भारत सरकार की इस योजना को लागू करवाने के लिये आगे आना चाहिए। हड़ताल और तोड़-फोड़ करने वाले लोगों का एकजुट होकर विरोध करना चाहिए। 

अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम के लाभ :
आम लोगों को क्या फायदा होगा केन्द्र सरकार के द्वारा शुरू किये जा रहे अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम से इसके बारे में जानने के लिए देखें भारत सरकार की गृह मंत्रालय के द्वारा बताये गये ये लाभ। 
1.  युवाओं का सेना में जाने का सपना साकार होगा। 
2.  बेरोजगार युवाओं को चार सालों तक सैन्य कार्य करने का अनुभव मिलेगा। 
3.  नौकरी के दौरान तकनीकी प्रशिक्षण यथा डिप्लोमा और डिग्री कोर्स करने का भी अवसर मिलेगा। 
4.  अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम के तहत 4 वर्षों तक नौकरी करते हुए तकनीकी विषयों से सम्बन्धित कोर्स पूरा करने के बाद सेवानिवृत्त होते ही कॉर्पोरेट सेक्टर में जगह हासिल करना आसान हो जाएगा। 
5.  चार वर्षों के बाद दूसरी नौकरियों में भी अवसर प्राप्त करना आसान हो जाएगा।
6.  पुलिस और रक्षा विभाग से सम्बन्धित दूसरी सेवाओं में वरीयता मिलेगी। 
7.  इस वरीयता के अनुसार अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम के तहत अग्निवीर बनने वाले 25% लोगों की नौकरियां पूर्णकालिक किया जा सकेगा। अर्थात 25% प्रतिभाशाली अग्निवीरों की नौकरी 62 वर्ष की आयु तक बढ़ाया जा सकेगा। 
8.  केन्द्र सरकार CAPFs और असम राइफल्स में नौकरी करने के लिए इच्छुक अग्निवीरों को प्राथमिकता देगी। 
9.  नौकरी के दौरान सभी कैडेट्स को सभी तरह की चिकित्सा सुविधाएं भी निःशुल्क उपलब्ध करवायी  जाएगी। 
10. बेहतर भविष्य बनाने के लिए जरूरी सभी आवश्यकताएँ यथा भोजन, वस्त्र, अनुशासित माहौल, तकनीकी शिक्षा, प्रशिक्षण, मासिक वेतन और अपने सपनों को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा दिए जाने वाले एकमुश्त पेंशन के साथ सरकारी विभागों में आगे भी नौकरी करने के लिए इच्छुक होने पर वरीयता का वादा एकसाथ केन्द्र सरकार के द्वारा मिलने पर युवाओं में देशभक्ति की भावना जगाने का प्रयास करना भी भारत सरकार के इस योजना का उद्देश्य है। 

शुक्रवार, 17 जून 2022

अग्निपथ के अग्निवीर कितनी करेंगे कमायी


AgnipathRecruitmentScheme

Background Investigation, खोज़ी खबर

अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम के तहत बहाल किये जाने वाले जवानों की शुरुआती वेतन 21,000/- रुपये होगी। जो सालोंसाल बढ़ते हुए 28000/- रुपये तक हो जाएगी। अग्निपथ रिक्रूटमेंट स्कीम नामक योजना के तहत बहाल होने वाले जवानों का वेतन दूसरे साल 23,100/- रुपये और तीसरे साल 25,580/- रुपये हो जाएगा। इस तरह से अपनी जरूरी आवश्यकतााओं में सेे कटौती करने के बावज़ूद ताउम्र 1,00,000 (एक लाख) रुपये की भी जुगाड़ नहीं कर पाने वाले परिवार के लोग भी अपने चार वर्षीय सेवा काल के दौरान 11,72,160/- रुपये तो वेतन के रूप में ही कमा लेंगे। इसके अलावा मात्र चार वर्षीय नौकरी पूरा कर के 24 वर्ष की आयु में अपना आगे का भविष्य अपनी इच्छा के अनुसार निर्धारित करने के लिए सेवानिवृत्त कर दिये जायेंगे। चार वर्षों की अवधि में नागरिकता के सभी अधिकारों और कर्तव्यों की शिक्षा लेने के बाद पेंशन के रूप में 11 लाख 71 हजार रुपये भी एकमुश्त प्राप्त करेंगे। जिसका इस्तेमाल अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए या अपना व्यापार शुरू करने के लिए कर सकेंगे। सरकार की इस योजना में कोई बुराई नहीं है। लेकिन कुछ लोगों का गिरोह इसके विरोध में रेल की पटरियां उखाड़ने और तोड़-फोड़ करके देश के संसाधनों को बर्बाद करने का काम कर रहे हैं, जो सर्वथा अनुचित है। 

केन्द्र सरकार की अग्निपथ योजना के तहत बहाल होने वाले युवाओं को कितनी कमाई होगी उसे संलग्न चार्ट से समझ सकते हैं। : 
पहला साल- 21,000×12= 2,52,000
दूसरा साल- 23,100×12= 2,77,200
तीसरा साल- 25,580×12= 3,06,960
चौथा साल- 28,000×12= 3,36,000
कुल वेतन का योग 11,72,160 रुपये 

रिटायरमेंट राशि 11,71,000 रुपये
कुल कमाई राशि का योग 23,43,160

मात्र चार वर्षों की सेवा अवधि में ही इतनी कमाई करने का अवसर देने वाला जॉब आर्मी की है। रहना-खाना, आर्मी का मुफ्त में प्रशिक्षण और इलाज़ आदि कई सुविधायें फ़्री है। मतलब यह है कि जो उम्र गलियों में क्रिकेट खेलने, नुक्कड़ों पर चाय और सिगरेट पीने में निकल जाती है, उन 4 सालों में 23 लाख 43 हज़ार 160 रुपये कमाने का सुअवसर भारत सरकार दे रहा है।

मात्र 17 से 23 साल की उम्र के लोगों के लिए यह योजना यूक्रेन और रूस में चल रहे युद्ध की विषम परिस्थितियों से निपटने के लिये यूक्रेन के सभी नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण की अनिवार्य शिक्षा कानून को देख कर शुरू किया है। आज विश्व में जो हो रहा है उससे निपटने के लिए इस तरह की योजना की आवश्यकता भी थी। मगर भारत को तोड़ने की साजिश करने वाले लोगों के उकसावे पर केन्द्र सरकार के द्वारा शुरू किये गये अग्निपथ योजना के विरोध में तोड़-फोड़ कर रहे हैं। अतः आप लोगों से अपील है कि देश विरोधी लोगों के उकसावे में आकर अपने ही हाथों अपना नुकसान नहीं करें। बल्कि अपने बच्चों को भारतीय सेना को ज्वाइन करने के लिए प्रेरित करें। विश्व मंच पर सबसे ज्यादा प्रसिद्ध प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी केन्द्र सरकार के पैसों से 4 वर्षों तक आपको आर्मी की ट्रेनिंग देंगे, साथ मे इतने सारे पैसे भी। जॉब वैसे भी नहीं है, बारवीं या ग्रेजुएशन करने के बाद सीधे अग्निपथ के रास्ते पर चले जाइए, यही आपका भविष्य है और हमारा भी।

उसके बाद 24-25 की उम्र में रिटायरमेंट के पैसों से अपना बिजनेस शुरू करें लीजिएगा,या इंडियन आर्मी की ट्रेनिंग के साथ गल्फ़ तो है ही, आर्मी का अनुशासन आपके बहुत काम आएगा। आपकी वर्तमान लाइफ जैसी अभी चल रही है, उससे बेहतर तय है। तो आप अग्निपथ योजना के विरोध का हिस्सा मत बनिए बल्कि ये समझिए कि, आप के लिए बल्क में, आर्मी तक नहीं पहुँचने देने का जो आरक्षण था अब वह ख़त्म हो चुका है।

अपना भविष्य सुरक्षित कीजिए और सोचिए 24 के उम्र में 0 से आर्मी ट्रेनिंग के साथ कुल मिला कर 11 लाख रूपये सैलरी के रूप में मिलने वाला पूरा पैसा अगर आप ख़त्म भी कर देते हैं तो रिटायरमेंट के वक़्त मिलने वाला 11 लाख 71 हज़ार रुपया कम नहीं है।

देश में 50% लोग ऐसे हैं जो पूरी उम्र में इतना पैसा नहीं कमाते जो  4 साल में अग्नीपथ से आयेंगे।💞
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शुक्रवार, 10 जून 2022

सबसे सस्ता गोल्ड बेचने वाले देश


आइये हम जानते हैं कहाँ मिलता है World's Cheapest Gold

दुनिया के इन देशों में मिलता है सबसे सस्ता सोना, लेकिन भारत में इसे सीमित मात्रा में ही ला सकते हैं। 
आपको बता दें कि दुनिया कई देशों में सोने के दाम भारत से 15 प्रतिशत तक कम किमत में मिलते हैं। लेकिन उन देशों की सूची में मुख्य रूप से कौन-कौन देश सम्मिलित हैं और उन देशों से कितना सोना भारत ला सकते हैं, आइए जानते हैं उनके बारे में।

विश्व में सबसे सस्ता सोना :

दुनिया के इन देशों में मिलता है सबसे सस्ता सोना, लेकिन भारत सीमित मात्रा में ही सोना ला सकते हैं।

दुनिया के कई देशों में Gold की दीवानगी सिर चढ़कर बोलती है। स्विटजरलैंड के ज्यूरिख शहर में लोगों को अच्छा और बेहतर सोना मिल सकता है, दुनिया में पर्यटन का एक प्रमुख केन्द्र दुबई भी गोल्ड का एक बड़ा हब है।
 
मानव सभ्यता के हजारों वर्षों के इतिहास में जिस चीज़ से इंसान ने बेइंतहा प्यार किया है, वह है सोना! सोने को लेकर इंसान की इसी दीवानगी ने सोने को दुनिया की सबसे बहुमूल्य धातुओं में से एक बना दिया है। यही कारण है कि सोने को मुश्किल दिनों का साथी भी कहा जाता है। दुनिया में तेल के बाद सबसे अधिक पैसा सोने में निवेश किया जाता है। 

सोने को लेकर दीवानगी सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों में इसकी दीवानगी सिर चढ़कर बोलती है। हम सभी ने विभिन्न अखबारों, मैग्ज़ीन्स, फिल्मोर और समाचारों में दुबई के बारे में जो तस्वीरें देखी और पढ़ी है उसमें दुबई का नाम सोने की सर्वाधिक तस्करी करने वाले देशों की सूची में पहला स्थान है। दुबई में जितने भी प्रसिद्ध गोल्ड मार्केट हैं वहां की दुकानों में भरे हुए जेवरात देख कर आँखें चौंधिया जाती है। ऐसे में आपके मन में भी सवाल उठ रहा होगा कि क्या वहां सोेना इतना सस्ता है? जी हां, दुनिया में कई देशों में सोने के दाम भारत से 15 प्रतिशत तक कम हैं। आइए जानते हैं इन देशों के बारे में.. 

दुबई :
सस्ते सोने के मामले में दुबई का मुकाबला शायद ही कोई दूसरा देश कर पाए। दुनिया में पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र दुबई गोल्ड का भी एक बड़ा हब है। यहां की सरकार सोने पर किसी प्रकार का टैक्स नहीं लगाती है, यह भी यहां सस्ता सोना मिलने का एक प्रमुख कारण है। यहां का दिएरा एक ऐसी जगह है, जहां गोल्ड सूक एरिया गोल्ड शॉपिंग का हब माना जाता है। 

स्विट्जरलैंड :
आपको स्विट्जरलैंड का नाम सुनकर स्विस बैंक का ख्याल जरूर आता होगा। लेकिन स्विटजरलैंड दुनिया भर में गोल्ड के लिए भी फेमस है। स्विस वॉचेज़ अपनी डिजाइनर गोल्डन घड़ियों के लिए काफी मशहूर है। इस देश में सोने का अच्छा कारोबार होता है। स्विटजरलैंड के ज्यूरिख शहर में लोगों को अच्छा और बेहतर सोना मिल सकता है। यहां हैंडमेड डिजाइनर गहनों के साथ आपको काफी वैरायटी मिलती है। 

हांगकांग :
एक समय ब्रिटिश कोलोनी रहे हांगकांग में टैक्स की रियायतें भी भरपूर हैं। ऐसे में चीन का यह स्वायत्त क्षेत्र दुनिया भर में गोल्ड शॉपिंग के लिए भी मशहूर है। हांगकांग में आपको सोना बेहद कम कीमत पर मिलता है। मालूम हो कि यह विश्व का सबसे एक्टिव गोल्ड ट्रेडिंग मार्केट में से एक है। 

थाईलैंड :
अपने सुंदर बीच और पर्यटन केंद्रों के लिए मशहूर थाईलैंड भी दुबई की तरह ही सस्ते सोने का केंद्र है। थाईलैंड के बैंकॉक में आप कम कीमत में अच्छी क्वालिटी का सोना खरीद सकते हैं। थाईलैंड के चाइना टाउन में यावोरात रोड सोना खरीदने के लिए सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है। यहां आपको बहुत कम मार्जिन में गोल्ड मिल जाता है और साथ ही अच्छी वैरायटी भी होती है। 

भारत :
अगले आलेख में आप पढ़ सकते हैं भारत के नये कस्टम रूल्स और भारत में कहाँ मिलता है सबसे सस्ता सोना? 🤔

भारत ला सकते हैं कितना सोना? 

सवाल उठता है कि थाइलैंड से लेकर दुबई तक आप सस्ता सोना खरीद सकते हैं। लेकिन विदेशों में खरीदा सोना क्या भारत लाया जा सकता है, इस पर टैक्स कितना देना होगा, आपको इस पर भी गौर करना चाहिए। देश में सोने के सिक्के गहने आदि लाने को बड़ी सख्ती से केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है। वित्त मंत्रालय के तहत आने वाली सेंट्रल इनडायरेक्ट टैक्स और कस्टम ने गाइड फॉर ट्रैवलर्स जारी की गई है। इसमें आपको बताया गया है कि विदेश से आप कितना सोना ला सकते हैं।

ये है ड्यूटी चार्ज :
जो नागरिक एक साल से विदेश में रह रहे हैं, वे अधिकतम 40 ग्राम सोना ही ला सकते हैं
यात्रियों को सीमा से अधिक गोल्ड लाने पर ड्यूटी कनवर्टिबल करेंसी में देना होता है।
गोल्ड बार, तोला बार जिस पर  मैन्युफैक्चर का नाम सीरियल नंबर लिखा होता है, 12.5 प्रतिशत की दर से सरचार्ज देना होता है।
अन्य प्रकार के गोल्ड जैसे कि पत्थरों या मोतियों से जड़े गहनों के अलावा 12.5 प्रतिशत ड्यूटी के साथ 1.25% समाज कल्याण सरचार्ज लगाया जाता है।


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