बुधवार, 21 अप्रैल 2021

एकांकी संग्रह : आरक्षण का दर्द

आरक्षण का दर्द

✍️ By प्रसेनजित सिंह

एकांकी : 01

पति एक दरगाह पर माथा टेककर घर लौटा, तो पत्नी ने बगैर नहाए घर में घुसने नहीं दी और बरस पड़ी। 
पत्नी : जब अपने चाचा को शमशान में जलाकर आये थे, तब तो खूब रगड़-रगड़ के नहाये थे। आज एक मुसलमान की लाश पर माथा टेक कर आ रहे हो तब नहीं नहाओगे?

पति:   किसकी लाश की बात कह रही हो? अरी बावरी, वो तो समाधी है।

पत्नी:  समाधि? समाधि कैसे हो गया वह? जब उसे जलाया ही नहीं गया? जलायेगा तभी तो समाधी बनेगी। उसमें तो अभी लाश ही पड़ी है।

पति:    अरे ऐसा नहीं कहते, वे तो देवता बन गये हैं।
पत्नी:  तो तुम्हारे चाचा क्या राक्षस थे? इन्हें देवी-देवताओं से इतना ही प्रेम रहता तो हमारे देवी-देवताओं की पूजा का विरोध नहीं करते। उनकी मूर्तियों को नहीं तोड़ते। 

पति:   अरी मुझे तो दोस्त अब्दुल ले गया था। नहीं जाते तो बुरा मान लेता। 

पत्नी:   तो उस अब्दुल को सामने वाले हनुमान मन्दिर में मत्था टेकवाने के लिए ले जाना। कल मंगलवार भी है।

पति:   वहाँ तो वह कभी नहीं जाएगा। ऐसे भी मन्दिरों को वे लोग काफ़ीरों की इबादतगाह समझते हैं। 🤔
ला तू पानी की बाल्टी दे-दे। नहीं तो मेरा भेजा खा जाओगी। 

पत्नी: तो चलिए कान पकड़ के कीरिया खाइये कि आज के बाद हिन्दुओं को काफ़ीर समझने वाले लोगों से कोई मतलब नहीं रखेंगे। उनके मजारों पर मत्था नहीं टेकेंगे। 
हम ईश्वर की सन्तान हैं तो हम लोग ही देवी और देवता हैं। राम और कृष्ण हमारे पूर्वज़ और हमारा घर ही एक मन्दिर है। तो अपने मन्दिर को छोड़ कर हिन्दुओं को काफ़ीर कहने वाले लोगों के दरवाजे पर सिर झुकाने क्यों जायें। जबकि पूर्वज़ों ने हमेशा यही सिखाया है कि दुश्मन के सामने सिर कभी भी झुकने मत देना। हमारे घर में रहने वाले हमारे परिजन ही देवी और देवता हैं। जब वे लोग हमारे सामने सिर नहीं झुकाते हैं तो आप क्यों ऐसा कर के अपनी नामर्दगी दिखाते हैं। तभी तो ये मुसलमान हम हिन्दुओं को आरे से चिरवा देते और बन्दा बहादुर माधो दास जैसे लोगों की भी बोटी-बोटी कर के हत्या करते हैं। ऐसे ही निर्दयी और क्रूर लोगों की आदि शक्ति ने संहार किया था। तब तुम आदि शक्ति और महादेव के विरोधियों के आगे सिर कैसे झुकाने लगे? अपने पितरों और देवी-देवताओं को नाराज़ कर के कभी भी घर में शान्ति और बरक्कत नहीं पाओगे। 

पति : हाँ! आज भी इस सृष्टी पर आदि शक्ति और महादेव की ही  मर्जी चलती है। इसे तो मैं भूल ही गया था। 🌹🙏🌹

हम सुख में हों तब भी और दुख में हों तब भी 
#जय_सनातन_धर्म_की 💞

📧 swamiprasenjeetjee@blogger.com 



💞💞💞💞💞💞⚔️⚔️🏦⚔️⚔️💞💞💞💞💞💞

एकांकी : 02


सेकुलर नेता : अरे वाह! देखो तो कितना तेज़ है यह। यह हरिजन होते हुए भी ३५ नम्बर ले आया और एक था भोदक्कर! जो राजपूत होते हुए भी मात्र ८४ नम्बर ही लाया था। साले! इन लफ्फुओं को अपने किस्मत पर रोने से फुर्सत मिलेगा तब नऽ हम रीजर्वेशन वालों की तरह मन लगा कर पढ़ेगा? 

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर नेता की वेश में) : ठीके कहे नेता जी! जब ई सवर्णबन सब के पहले ही बता दिया गया है कि पास होने के लिए कम से कम ८५ नम्बर लाना जरूरी है। तब तो इन लोगों में बेरोजगारी की समस्या के लिए सरकार की कोई गलती नहीं है। सिर्फ़ एक नम्बर और ले आता तो उसे भी नौकरी मिल जाती। नहींऽ?

सेकुलर नेता : अरे बुर्बक! उसे सरकार की कोई सुविधा नहीं मिले इसीलिए तो यह रीजर्वेशन का कानून बनाया गया है।

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर नेता की वेश में) : क्या? 

सेकुलर नेता : तुम्हें समझ में नहीं आता है कि जिसे ब्लेड भी पकड़ने नहीं आता है, वह सर्जन कैसे बन जाता है? जिसे ठीक से ककहरा और पहाड़ा भी नहीं आता है वह सरकारी टीचर कैसे बन जाता है? चलो जाओ, माथा मत खाओ।

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर नेता की वेश में) : नेता जी! सिर्फ़ एक नम्बर के कारण ही न नौकरी नहीं ले पाया। 

सेकुलर नेता : अरे बुर्बक! तुम्हारी तरह ही उसे भी लगता होगा कि वह मात्र एक नम्बर और ले आता तो नौकरी उसे मिल जाती। लेकिन उस मूर्ख को रीजर्वेशन का पावर अभी नहीं पता है। इस रीजर्वेशन के कारण ही हम जाहिल होते हुए भी उसकी नौकरी छीन लेते हैं। वह कितना भी नम्बर लाएगा जीत हमें ही मिलेगा। वह दरोगा होगा और हम सिपाही होंगे, तब भी उसे ही हम से डरना होगा। वह प्रमोशन पाकर ज्यादा से ज्यादा डीएसपी तक पहुंचेगा लेकिन हम प्रमोशन में भी रीजर्वेशन लेकर डीजीपी बन जायेंगे तब उसकी सारी हेकड़ी निकाल देंगे। ये बात सब सवर्ण जानता है, इसलिए औकात में रहता है। हम लोग यदि उससे आगे नहीं बढ़ पाए तब भी वह जादे अलबलायेगा तो हरिजन एक्ट में लपेट के सब सवर्णगिरी निकाल देंगे।

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर नेता की वेश में): ठीके कह रहे हैं सर। सारा भीख मिलते हुए भी यह ३५ नम्बर ले आया और वह राजपूत! जिसके पूर्वजों से सुनते हैं कि देश की एकता के नाम पर राज-पाट, खेत-खलिहान सब ठग लिया गया, वह बिना कोई सरकारी सुविधा लिए ८५ नम्बर भी नहीं ला पाया है? लेकिन एक बात समझ में नहीं आता है कि यह ८४ नम्बर ज्यादा होता है कि ३५ नम्बर?

सेकुलर नेता : अरे बुर्बक! ज्यादा नम्बर तो ८४ ही होता है। लेकिन उन लोगों को समझ में आता है थोड़े न? वे लोग समझबे करते तो आज तक चुप थोड़े रहते। हाःऽ हाःऽ हाःऽ हाःऽ (जोरदार ठहाका)।

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर नेता की वेश में) : अच्छा नेता जी! एक बात और पूछना चाहते हैं, सरकारी सुविधा और बिना सरकारी सुविधा में क्या अन्तर है? बिना सरकारी सुविधा वाला! सरकारी सुविधा लेने वालों से ज्यादा सुविधाओं वाला होता है क्या? 

सेकुलर नेता : अरे बुर्बक! जिसको सरकार से कोई सुविधा नहीं मिले उसको बिना सरकारी सुविधा वाला कहा जाता है। जिसके पास भर पेट खाना खाने का भी औकात नहीं होता है, फिर भी सरकार से कोई मदद नहीं मिलता है उसे बिना सरकारी सुविधाओं वाला कहा जाता है। जिसे जरूरत होने पर भी सरकारी सुविधा नहीं दिया जाता है उसे बिना सरकारी सुविधा वाला कहा जाता है। 

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर नेता की वेश में) : तब तो यह अन्याय है। बिना कोई सुविधा वाला आदमी कहाँ से महँगा-महँगा किताब खरीदेगा? कैसे कोचिंग सेंटर या ट्यूशन फीस का जोगाड़ करेगा? बिना कोई सुविधा के सरकारी सुविधा लेने वालों से ज्यादा नम्बर लायेगा?

सेकुलर नेता : अरे बुर्बक! किसकी चिन्ता कर रहे हो? उन सवर्णों की? आगे-आगे देखते जाओ। हमारा समता मूलक कानून कैसे सारे सवर्णों को भिखाड़ी बना कर इस देश से खदेड़ देगा। फिर सारा भारत हमारा होगा। 

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर नेता की वेश में) : वाह नेता जी! आपने समता मूलक समाज का बहुत बढ़िया कानून बनवाया है। इनके साथ क्या खेल खेला जा रहा है, इन्हें कुछ समझ में थोड़े न आता है। इनसे अपने यहाँ झाड़ू-पोछा लगवाइये, दरबान और चपरासी बना कर खटबाइये और सिर्फ़ "का हो बाऽबू साहब!" कह दीजिए। ई सब इसी से फुल कर कुप्पा हो जाता है। ...फिर इनका वेतन पचा लीजिए, तब भी कुछ नहीं बोलेगा। क्याऽ ठीक कहे नऽ?

सेकुलर नेता : ठीकेऽ कहा। हाःऽ हाःऽ हाःऽ हाःऽ (ठहाका) ई राजपुतवन-भूमिहरवन के कुछ बुझाता है थोड़े नऽ। ई सब के दिमाग तो तलवार में होता था, जिसे हमनी सब कहिए छीन लिए।

साम्प्रदायिक कार्यकर्ता (सेकुलर का चोला फेंक कर) : नेता जी! अब तलवार के जमाना नहीं रहा, ईऽ रीवाल्वर के जमाना है। आप नेतागिरी करते हैं, तब नेता जी की तरह बनिए। बिना किसी को जाने-पहचाने अनाप-शनाप बकना बन्द कीजिए। जिसे आप भोंदू कह रहे हैं वह ८४ नम्बर लाकर भी इस सरकार की नौकरी नहीं ले पाने वाला रजपुतवा हम ही हैं। अब आपका पोल खुल गया है। मत भूलिए कि अम्बेदकर जी को हमारे ही पूर्वज़ ने सहारा देकर आगे बढ़ाया था। आप जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर सेकुलर होने का ड्रामा कर रहे हैं, इस लोक तंत्र को दुनियाँ में फैलाने वाले हम ही हैं। लोकतंत्र का मतलब अँधतंत्र नहीं होता, बल्कि प्रजातंत्र होता है। अच्छा हुआ जो आपने खुद सेकुलरिज्म का अर्थ समझा कर अपनी मंशा बता दिये हैं। आपकी हकीकत जान कर सवर्ण समाज के लोग जरूर जागरूक होंगे और आपके इस सेकुलरवाद को खत्म कर के असली लोक तंत्र को मजबूती के साथ कायम करेंगे। आप भी इस देश की एकता के लिए जाति-धर्म का भेद-भाव छोड़कर आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए आवाज उठाइए। इस से आप ज्यादा बड़ा नेता कहायेंगे। नहीं तो अब हमें और बुर्बक नहीं बना पायेंगे।



गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

वारङ्गियन गार्ड्स का सच : Varangian guards in Veda & Harivansh Puran


वाराङ्गियन का पौराणिक इतिहास

वाराङ्गियन गार्ड्स के नाम से मशहूर जिन लोगों के पूर्वज़ रोमन साम्राज्य के मुख्य सैन्य अधिकारी के रूप में काम करते हुए पूरी दुनियां में अपनी बहादुरी का डंका बजवायें, ये लोग कौन हैं? इनका कैसा सम्बन्ध है कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणशाही राजकुमार विजयपोरस के वंशज़ों द्वारा रोमन साम्राज्य को अपने अधीन कर के विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य खड़ा करने वाले विजयन्तियम् साम्राज्य के राजवंश के साथ? आयें आज बताते हैं इनके बारे में पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित गौरवशाली इतिहास।

आदिग्रन्थ महाभारत और हरिवंश पुराण की कथाओं में कश्यप नन्दन वज्राङ्ग और वाराङ्गी नामक उनकी पत्नी से सम्बन्धित एक रोचक कथा का उल्लेख किया गया है। वह कथा कश्यप ऋषि की १३ पत्नियों में से ज्येष्ठ पत्नी दिती परमेश्वरी से डाह रखने वाली दूसरी पत्नी देवी अदिति के पुत्रों के द्वारा दिती परमेश्वरी के पुत्रों के साथ किये जाने वाले साजिश और प्रपञ्च का खुलासा करने वाला एक सत्य कथा है। इस कथा को काल्पनिक और मनगढ़ंत कहने वाले लोग कथा के पात्रों को भी काल्पनिक कहते थे। लेकिन मुझे जैसे ही पश्चिमी देशों में रहने वाले वाराङ्गियन गार्ड्स के नाम से प्रसिद्ध एक जातिय समुदाय के बारे में पता चला, उनके रीति-रिवाज़ों और रहन-सहन के तौर-तरीकों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने से खुद को रोक नहीं पाया। मैंने जब उन लोगों को करीब से जाना तब मुझे पक्का यकीन हो गया की ये लोग उसी वज्राङ्ग के वंशज़ हैं, जिनके नील नामक पुत्र के अंश से वज्राङ्ग बलि के नाम से प्रसिद्ध वीर हनुमान का जन्म हुआ था। ये हनुमान! देवी वाराङ्गी के गर्भ से उत्पन्न ४९ (उञ्चास) मरुद्गणों में से नील नामक मरुत के पुत्र होने के कारण ही मारुति कहलाये तथा किस्किंधा के राजा सुग्रीव के मित्र और अवध के राजकुमार श्री रामचन्द्रजी के सहायक बने थे। निश्चित रूप से वीर हनुमान और बजरङ्ग बलि के नाम से हिन्दुओं के द्वारा पूजे जाने वाले अंजनी नन्दन के पूर्वज़ों के ही वंशज़ हैं पश्चिमी देशों में रहने वाले ये वाराङ्गियन। इनके पूर्वज़ों के साथ इन्द्र, वरूण, मित्र, सूर्य और विष्णु आदि आदित्यों ने किस-किस तरह के अत्याचार किये थे उसका भी मार्मिक वर्णन किया गया है पौराणिक कथाओं में। इन्हें इनकी मूल भूमि से खदेड़ कर रसातल में बसने के लिए मजबूर किया गया था। पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित रसातल ही वर्तमान रसिया या रूस की धरती है। इसी धरती पर स्थित कजाखस्तान! कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों की मूल भूमि है। यूची के नाम से प्रसिद्ध लोग कौशिक गोत्रीय ब्राह्मण परिवार के लोग ही थे। इन लोगों के साथ वहाँ से पश्चिमी देशों की ओर पलायन करने वाले लोगों में ये वाराङ्गियन समुदाय के लोग भी शामिल थे। 

हरिवंश पुराण के अध्याय ....... ✍️ क्रमशः 

वाराङ्गियन गार्ड्स के गीत

Turisus - The march of the Varangian guard [Lyrics]


 
Varangians are the dynasty of Vaidic Emparor Vajrang and her wife Varangi which are the Roman catholic family members. 

शनिवार, 28 नवंबर 2020

कविता : मेरा मन यायावर

बेवफा

देखा था तुम्हें जिस दिन मैने
समझा था कि तुम बड़ी भोली हो।
तुम हँसी तो हो, नादां भी कुछ 
मनमोहनी और हमजोली हो।
यह सोच के दिल मैं दे बैठा 
तेरे इश्क में पागल होकर मैं। 
पर अब यह सोच के रोता हूँ 
क्या देख के तुम से प्यार किया। 
तुम नादां हो इसको तुम में
मैंने पहले ही देखा था। 
पर जालिम हो और कातिल भी
इस को मैने नहीं समझा था। 
आखिर तुम क्यों मेरे दिल में बस
मन मोह लिया दिल जीत लिया। 
फिर क्या आखिर मजबूरी थी
यह दिल तूने क्यों तोड़ दिया।
तुम्हें जहाँ भी रहना वहीं रहो
पर अब ऐसा फिर मत करना।
वर्ना तेरे कारण नारी पर
फिर से कभी यकीं नहीं होगा।
नहीं इश्क करेंगे कोई कहीं
बर्बाद गुलिस्तां यह होगा



 


बुधवार, 4 नवंबर 2020

आँसुओं का समुन्दर


 
माफ़ी का महत्व

(दहेज़ उत्पीड़न कानून से पीड़ित परिवार की सत्य कथा

राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।

दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे। 

चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए।

राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन  दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा।

राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे।  दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी।

इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।

सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।

नवीन घर मे अकेला ही रहता था।  मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं। 

राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।

घर मे परिवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से  धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने।

सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था।

नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला "ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा"

राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।

वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर  समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे। 

प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है। 

बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी। 

फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।

न राधिका लोटी और न नवीन लाने गया। 

राधिका की माँ बोली" कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?"

"चुप रहो माँ" 

राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया। 

बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया।

राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही।  फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया। 

नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया " रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।"

गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी। 

"क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था" 

"कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।"

सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।

"नही चाहिए। 

वो दस लाख भी नही चाहिए"

 "क्यूँ?" कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया।

"बस यूँ ही" राधिका ने मुँह फेर लिया।

"इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।"

इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।

राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी।

राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई।

वो रो रहा था। अजीब सा मुँह बना कर।  जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।

मग़र ज्यादा भावुक नही हुई।

सधे अंदाज में बोली "इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?"

"मैंने नही तलाक तुमने दिया" 

"दस्तखत तो तुमने भी किए"

"माफी नही माँग सकते थे?"

"मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।"

"घर भी आ सकते थे"?

"हिम्मत नही थी?"

राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। "अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया"

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी। 

राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।"

फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र  वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है। 

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं।

कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?

फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी।

कितने सुनहरे दिन थे वो।

इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।

बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया। 

अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।

बोला-" मत जाओ, माफ कर दो"

शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बाँध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया । 

और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।

दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि 

कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।

काश उनको पहले मिलने दिया होता?


🙏🙏 अगर माफी मांगने से ही रिश्ते टूटने से बच जाए, तो माफी माँग लेनी चाहिए। मगर जब माफी माँगने के बाद भी पत्नी की अकड़ कम न हो तो पुरुषों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए "पुरूष आयोग" का गठन करवाने के प्रयास में लग जाना चाहिए।